अरविंद

श्री अरविंद : अतिमानसी स्वप्नद्रष्टा

नियति स्वयं मानवजाति के भाग्य का इतिहास लिखती है । इस कथन पर यों तो पूरे भारत में विश्वास करनेवाले अधिकांश लोग मिल जाएँगे, किंतु श्री अरविंद में, उनके विचारों में श्रद्धा रखनेवाले उनके भक्तों का यह विश्वास हिमालय – सा अडिग है । वे मानते हैं कि श्री अरविंद को विधाता ने भारत की स्वतंत्रता के लिए ही भेजा था और भारत की स्वतंत्रता में विश्व मानव की स्वतंत्रता एवं भावी मानव के अतिमानसी चैतन्य विकास का संकल्प निहित है । उनके भक्तों का कहना है –

“हमने देखा है कि भारत की स्वतंत्रता के अवसर पर श्रीअरविंद ने जो संदेश दिया , वह उस व्यक्ति की स्वप्नकथा के समान है, जिससे न केवल मनुष्य का भाग्यसूत्र जुड़ा हुआ है, वरन् जिससे जुड़ी हुई है पार्थिव विसृष्टि, उसकी विकास- कथा, उसकी सर्वोच्च नियति और उसका सर्वोच्च दिव्य भविष्य । भारत की स्वतंत्रता, उसकी एकता तथा स्वभाव और स्वधर्म में उसकी पूर्ण प्रतिष्ठा मानो इस कथा की आधारशिला हो । भारत को अपनी स्वतंत्र प्रतिभा के साथ विश्व के रंग-मंच पर आना चाहिए । “

(श्री अरविंद और हमारा युग, ले. छोटे नारायण शर्मा, पृ. 100- 101)

श्री अरविंद के अनुयायी का उक्त कथन अपने आशय और विश्वास में उनके जीवन, संघर्ष और अध्यात्म -विचारों को आधार बनाकर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य दे रहा है । श्री अरविंद ने स्वयं भी समय- समय पर अपनी उक्त विशिष्ट भूमिका का उल्लेख किया है । इस तथ्य को प्रमाण देती है श्री अरविंद के जन्म की तिथि 15 अगस्त , 1872 की घटित वास्तविकता, जो कि 15 अगस्त, 1947 को भारत की स्वतंत्रता से जोड़कर देखी गई । स्वयं श्री अरविंद के ये शब्द साक्ष्य बनकर प्रस्तुत हुए –

“15 अगस्त मेरा अपना जन्मदिन है और स्वभावतः ही यह मेरे लिए प्रसन्नता की बात है कि इस दिन ने इतना विशाल अर्थ तथा महत्त्व प्राप्त कर लिया है । परंतु इसके भारतीय स्वाधीनता-दिवस भी हो जाने को मैं कोई आकस्मिक संयोग नहीं मानता, बल्कि यह मानता हूँ कि जिस अर्थ को लेकर मैंने अपना जीवन आरंभ किया था, उसको मेरा पथ- प्रदर्शन करनेवाली भागवत- शक्ति ने इस तरह मंजूर कर लिया है और उस पर अपनी मुहर भी लगा दी है तथा यह कार्य पूर्ण रूप में सफल होना आरंभ हो गया है।”
—(श्री अरविंद और हमारा युग, ले. छोटे नारायण शर्मा, पृ., पृ. 7)

श्री अरविंद 15 अगस्त , 1947 को , भारत की स्वतंत्रता को भारत के जन्मदिन के रूप में तथा 15 अगस्त, 1872 को अपने जन्मदिन, दोनों को जोड़कर देखते हैं । पुराने युग की समाप्ति तथा नए युग के उदय को रेखांकित करते हैं, “जो संपूर्ण जगत् के लिए, सारी मानवजाति के राजनीतिक , सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक भविष्य के लिए नवयुग लानेवाला सिद्ध हो । ” उन्होंने ऐसी भावना व्यक्त की तथा अपने तीन स्वप्नों का उल्लेख करते हुए कहा कि मेरा पहला स्वप्न है एक क्रांतिकारी आंदोलन, जो स्वाधीन और एकीभूत भारत को जन्म दे । हिंदू, मुसलमान आदि सब मिलकर प्रेमपूर्वक भारत को आगे ले चलें । भारत का विभाजन समाप्त हो ।

यह भारत के भविष्य तथा महानता के लिए आवश्यक है । दूसरा , एशिया की जागृति एवं इसके देशों के पुनरुत्थान का तथा उन देशों के मध्य भारत के महत्त्वपूर्ण प्रेरक के स्थान को प्राप्त करने का । तीसरा स्वप्न विश्व – संघ, जो मानवजाति के लिए एक सुंदरतर, उज्ज्वलतर और महत्तर जीवन का बाहरी आधार निर्मित करे । मानव -संसार का वह एकीकरण प्रगति के पथ पर है । उन्होंने यह भी कहा था कि नए विकास “पार्थिव धरातल पर अतिमानसी परिवर्तन निर्दिष्ट और अनिवार्य है, क्योंकि ऊर्ध्वगामी विकास की प्रक्रिया समाप्त नहीं हो गई है और मन इसका आखिरी शिखर नहीं ।

श्री अरविंद के पिता श्रीकृषाधन घोष पूरी तरह अंग्रेजियत के रंग में रंगे हुए थे। इतना ही नहीं, वह अपनी संतानों को भारतीय संस्कृति, आचार-विचार से भरसक दूर रखकर अंग्रेजियत में रँगना चाहते थे । श्री अरविंद की माता श्रीमती स्वर्णलता देवी ब्रह्मसमाज के हिमायती ऋषि राजनारायण की बड़ी पुत्री थीं तथा भारतीय संस्कारों में पली बढ़ी एवं ओतप्रोत थीं । श्री अरविंद माता-पिता की तीसरी संतान थे। दो बड़े भाई विनयभूषण और मनमोहन थे । श्री अरविंद की एक छोटी बहन सरोजिनी थी तथा सबसे छोटा भाई वारींद्र कुमार घोष था । पाँच वर्ष की आयु में
श्री अरविंद दार्जिलिंग के लोरेटो स्कूल में दाखिल किए गए । फिर दो वर्ष उपरांत 1879 ई. में इनके पिता पूरे परिवार सहित इंग्लैंड चले गए । वहाँ श्री अरविंद सेंट पाल स्कूल में तथा बाद में किंग्स कॉलेज में दाखिल हो शिक्षा पाते रहे । उन्हीं दिनों इन्होंने अंग्रेजी के अतिरिक्त इटालियन , जर्मन , स्पेनिश आदि भाषाएँ भी सीखीं । यूरोप के प्राचीन, मध्ययुगीन एवं अर्वाचीन इतिहास का अध्ययन किया । तभी इनकी रुचि कविता लिखने में होती गई ।

सन् 1890 में श्रीअरविंद ने आई. सी .एस. की परीक्षा तो पास कर ली, किंतु वह घुड़सवारी में शामिल नहीं हुए एवं फेल कर दिए गए । उन्होंने भारत में बड़ौदा में नौकरी की । इसमें वे 8 फरवरी , 1893 से 8 जून , 1907 तक रहे । बड़ौदा में नौकरी के दौरान उन्होंने भू -व्यवस्था और राजस्व -व्यवस्था के अतिरिक्त महाराजा के निजी सचिवालय में कार्य किया । तभी की रची हुई उनकी कविता भगवान का श्रम (A God s Labour) इस प्रकार है –

अपना मैं देवत्व लाँघकर उतर यहाँ आया हूँ,
मृत्युलोक की ज्वाला पीने आप चला आया हूँ ।
अज्ञानी बन श्रमिक सहे मैंने अनंत संताप ,
जन्म – मरण के बीच पंथ का पथिक बना हूँ आप ।

श्री अरविंद का विवाह अप्रैल, 1901 में श्रीमती मृगालिनी देवी से हुआ। वह ब्रह्मसमाज में रँगे श्री भूपाल वसु की कन्या थी और पिता के जैसे संस्कारों को लिये हुए थी ।

श्री अरविंद सौम्य, शांत, कोमल, स्नेही तथा विनोदी स्वभाव के थे, किंतु इन सब पर गहरे राष्ट्रीय संस्कार (जिन्हें वह दैवी कृपा मानते थे), उनके स्वभाव एवं चरित्र के अविभाज्य गुण थे। उन्होंने एक पत्र में अपनी पत्नी मृणालिनी को लिखा था

“लोग स्वदेश को जड़- पदार्थ, कुछ मैदान, खेत , वन, पर्वत , नदी भर समझते हैं , मैं स्वदेश को माँ मानता हूँ । उसकी भक्ति करता हूँ, पूजा करता हूँ । माँ की छाती पर बैठकर यदि कोई राक्षस रक्तपान करने के लिए उद्यत हो, तो भला लड़का क्या कर सकता है ? निश्चित रूप से भोजन करने , स्त्री – पुत्र के साथ आमोद- प्रमोद करने के लिए बैठ जाता है या माँ का उद्धार करने के लिए दौड़ पड़ता है ? मैं जानता हूँ, इस पतित जाति का उद्धार करने का शारीरिक बल मेरे अंदर नहीं है ।

तलवार या बंदूक लेकर मैं युद्ध करने नहीं जा रहा हूँ । परंतु ज्ञान का एक बल है । क्षात्र तेज एकमात्र तेज है । ब्रह्म तेज भी एक तेज है । वह तेज ज्ञान के ऊपर प्रतिष्ठित होता है । यह भाव नया नही है, आजकल का नहीं है । इस भाव को लेकर ही मैंने जन्म ग्रहण किया है । यह भाव मेरी नस -नस में भरा है । भगवान् ने उसी महाव्रत को पूरा करने के लिए मुझे पृथ्वी पर भेजा है । ” (श्री अरविंद और हमारा युग, ले. छोटे नारायण शर्मा पृ. 37)


सन् 1901 – 2 के आस पास ही श्रीअरविंद की सहायता से यतींद्रनाथ बनर्जी बड़ौदा राजा की सेना में इस आशय से भरती हुए, ताकि वहाँ शिक्षण पाकर वह बंगाल में लौटकर अन्य युवकों को सशस्त्र क्रांति के लिए तैयार कर सके । श्री मंडवले ने उन्हीं दिनों श्रीअरविंद को क्रांतिकारी दल की गुप्त शपथ दिलाई । बाद में वारींद्र ने भी क्रांतिकारी कामों में हिस्सा लेना आरंभ कर दिया । अब कलकत्ता में श्रीअरविंद का कार्यक्रम तेजी से चलने लगा । खुलना, रंगपुर, मिदनापुर और ढाका में भी केंद्र खोले जा रहे थे । श्रीअरविंद ने वंदे मातरम् पत्रिका निकाली और राष्ट्रीय
चेतना के विकास को और भी गति देने लगे । इससे अंग्रेज शासक बहुत क्रोधित हुए । किंतु दूसरी ओर श्री अरविंद की घोषणा थी — “राष्ट्रवाद एक धर्म है । राष्ट्रवाद की शक्ति भगवान् की शक्ति है ।” उन्होंने भवानी मंदिर में लिखा — भारत का अंत नहीं हो सकता, हमारी जाति मर नहीं सकती, क्योंकि मानवजाति के जितने भी टुकड़े हैं, उनमें यह भारत ही है, जिसके लिए सबसे ऊँचा और महान् भाग्य निर्दिष्ट है, सुरक्षित है; यह तो मानवजाति के भविष्य के लिए अत्यावश्यक है ।


“अब श्रीअरविंद योगाविष्ट मानसिक स्थिति में रहने लगे । कश्मीर में उन्हें ब्रह्मतत्त्व का दर्शन हुआ था और नर्मदा तट पर एक काली मंदिर में देवी की जीवंत उपस्थिति का अनुभव हुआ । अब उनका अटूट विश्वास बन चुका था कि भारत जीवित रहा तो मानवता भी जीवित रहेगी । भारत को यदि एक राष्ट्र के रूप में फिर से उठना है ” तो अपनी शक्ति के मुख्य स्रोत, प्राचीन भारतीय जीवन की आधारशिला और हमारी जीवन- शक्ति के मूलाधार गाँवों को सब प्रकार से स्वाश्रयी, स्वावलंबी बनाना होगा ।” (श्री अरविंद और हमारा युग, ले. छोटे नारायण शर्मा, पृ. 53) ।

श्री अरविंद के विचारों और गतिविधियों से अंग्रेजी सत्ता बौखला गई । उन्हें बार- बार पकड़ती, राह रोकती। इसी सिलसिले में 5 मई , 1908 को उन्हें गिरफ्तार कर अलीपुर जेल में रखा गया । साल भर मुकदमा चला और जज के फैसले पर उन्हें मुक्त कर दिया , क्योंकि श्रीअरविंद का उस बमकांड से कोई संबंध नहीं था, जिसके कारण उन्हें बंदी बनाया गया था । इस दौरान जेल में श्रीअरविंद मौन ध्यान – समाधि में रहकर साधना करते रहे । उन्होंने अपने जेल – जीवन का अनुभव बताते हुए कहा, “मैंने अपने को मनुष्यों से अलग करनेवाली जेल की ओर दृष्टि डाली और यह पाया कि अब मैं उसकी ऊँची दीवारों के अंदर बंदी नहीं हूँ, अब तो मुझे घेरे हुए हैं स्वयं वासुदेव!” (श्री अरविंद और हमारा युग, ले. छोटे नारायण शर्मा, पृ. 56)

मुक्त होकर उन्होंने बँगला में धर्म तथा अंग्रेजी में कर्मयोगी पत्रिकाएँ निकाली । बाद में भागवत प्रेरणा से वह 1 अप्रैल, 1910 को कलकत्ता से रवाना हुए और पांडिचेरी आ गए । पांडिचेरी में उनका यह ऊँचे आध्यात्मिक धरातल पर, ऊँचे विधान पर, ऊँची भूमिका का आरंभ था । श्री अरविंद जिस तपस्या में लीन थे, उसमें उनका पक्ष ज्ञान का पक्ष था, उसे पूर्ण करने के लिए क्रिया-पक्ष के रूप में फ्रांस में 1878 को जनमी श्रीमाता जी पांडिचेरी आई । उन्होंने 29 मार्च, 1914 को पहली बार श्री अरविंद से भेंट की । यहीं श्री अरविंद ने आर्य नाम से पत्रिका का सोद्देश्य प्रकाशन आरंभ किया, जिसमें श्रीमाँ का भी पूरा सहयोग- समर्थन था । उधर द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण श्री माँ फ्रांस लौट गई और 24 अप्रैल, 1920 को पुनः पांडिचेरी लौटीं ।

श्री अरविंद ने अपने अध्यात्म – दर्शन को अपने काव्यों के माध्यम से भी व्यंजित -व्यक्त किया है । संभवतः काव्य के माध्यम से वह अपने विचारों- भावों को अधिक गहराई और व्यापकता में प्रकट कर पाए हैं । उनकी प्रबंध रचनाओं में दो खंड – काव्यों उर्वशी तथा लव एंड डेथ को महत्त्व दिया जाता है, किंतु सर्वाधिक महत्त्व उनके महाकाव्य सावित्री को प्राप्त है । महाभारत में उपलब्ध सावित्री- सत्यवान के आख्यान को उन्होंने स्वयं रूपक काव्य माना है । इस महाकाव्य को उन्होंने पाँच – छह बार पुनर्संस्कारित किया और अपना समूचा अध्यात्म मंतव्य इसमें उँड़ेल दिया । पाठक – अध्येता के ऊपर निर्भर है कि वह इस रूपक – काव्य के क्या – क्या आशय लेता है ।

साधना(सावित्री) द्वारा मृत्यु (यम देवता) को जीतकर सत्य (सत्यवान) को उपलब्ध किया जा सकता है । दूसरा रूपक ज्ञान की प्रबुद्धि, सविता तथा उसके प्रकाश (सावित्री) के तप से मार्ग की कठिन बाधा (यम) को पार करके सत्य (सत्यवान) को प्राप्त करना संभव हो सकता है । अत : अतिमानसी अवस्था की प्राप्ति की अवधारणा को श्री अरविंद ने इस महाकाव्य के माध्यम से मूर्त एवं साकार किया है ।

श्री अरविंद ने मंत्र – काव्य की कोटि को भी स्वीकार किया है । एक महत्त्वपवूर्ण आलोचना ग्रंथ द फ्यूचर पोयट्री में उन्होंने काव्य- कोटियों के विषय में अपने विचार दिए हैं । अतः सावित्री महाकाव्य को मंत्र महाकाव्य की कोटि में रखा जा सकता है, क्योंकि इसमें भावों, विचारों, रीति एवं संरचना में मंत्र जैसी पावनता तथा शक्ति संहित है । भावों, विचारों की अभिव्यक्ति उदात्त शिखर पर पहुँचाती है । सावित्री महाकाव्य का स्थान विश्व – साहित्य में भी अपनी विशिष्टता सिद्ध करता ह और भावी मानव एवं विश्व के यात्री की जयता का उद्घोष करता है ।

श्री अरविंद का योग मोक्ष के लिए या दिव्यधाम में प्रवेश के लिए नहीं, बल्कि जीवन के दिव्य रूपांतरण का योग है और श्री माँ इसकी अधिष्ठात्री महाशक्ति हैं । अपने इस दिव्य कार्य को संपन्न करने की खातिर श्री अरविंद ने अपनी यह पार्थिव भूमिका समाप्त कर दिव्य भूमिका में आने का संकल्प व्यक्त करते हुए 4-5 दिसंबर, 1950 की मध्यरात्रि को यह जीवन- यज्ञ संपन्न किया । 29 दिसंबर को श्रीमाँ ने शोकाकुल अनुयायियों को संदेश दिया कि “हम लोगों के दिव्य स्वामी ने हमारे लिए अपना संपूर्ण बलिदान कर दिया है ।

इससे पूर्व 9 दिसंबर को प्रातः भी श्री माँ ने कहा था – “हे भगवान्! आज सुबह आपने मुझे यह आश्वासन दिया है कि जब तक आपका काम संपन्न नहीं हो जाता, आप हमारे साथ रहेंगे, केवल उस चेतना के रूप में नहीं, जो प्रकाश देती है और राह बतलाती है वरन् कर्म में सक्रिय उपस्थिति के रूप में ।” (श्री अरविंद और हमारा युग, ले. छोटे नारायण शर्मा, पृ. 104 )

अतः हम देखते हैं कि इस विश्व के भावी विनाश को वैज्ञानिक लक्ष्य करते हुए तीसरे विश्वयुद्ध के बाद की जो भयावह तसवीर दिखाते हैं, ठीक उसके विपरीत श्रीअरविंद भारत की दिव्य भूमिका और विश्व – मानव के रूपांतरण की तथा अतिमानसी सिद्धि की सुनिश्चित भविष्यवाणी करते हैं । विश्व में तथा भारत में व्याप्त अनेक प्रकार के अँधेरों से निजात पाकर इनसे बाहर निकलने के संकल्पों को भी वह दोहराते हैं । उनका विश्वास रहा है कि मनोमय चेतना से जितना विकास संभव था, वह प्राचीन योग विद्या से सिद्ध हो चुका है, किंतु अतिमानसी सिद्धि अब श्रीकृष्ण चेतना के श्रीअरविंद के भौतिक शरीर में आप्यायित हो उठने से इस विश्व में प्रसरित एवं व्याप्त होगी ।

इसी को श्री माँ ने कर्म में सक्रिय उपस्थिति कहा है । विश्व के इतिहास में श्रीअरविंद जो कुछ प्रस्थापित कर गए हैं, वह कोई शिक्षा नहीं, भगवत- प्रदत्त ज्ञान भी नहीं है, वह तो परात्पर भगवान् से सीधे आया हुआ एक सुनिश्चित कार्य है ।

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