बुल्लेशाह

बुल्लेशाह : इश्क के मस्त सूफी संत

पाच दरियाओं ( नदियों) के प्रवाहों से सींची गई पंजाब की मिट्टी में जनमे, विश्वविख्यात सूफी संत बुल्लेशाह धार्मिक जड़ता और पाखंड के कट्टर विरोधी थे। धर्म के नाम पर भोले-भाले लोगों को ठगनेवाले, अत्याचार करनेवाले तथा झूठी सौगंध खाने एवं दिखावा करनेवाले ढोंगियों को वह बुरी तरह फटकार लगाते थे। मुँह से तौबा, किंतु मन से ठगी तथा सूदखोरी करते हो , जो कि इसलाम में बुराई मानी जाती है । ऐसा करनेवाले मुसलमान नहीं हो सकते । बुल्लेशाह के इन दो – टूक तथा इसलाम और मानव के पक्षधर विचारों के कारण निहित स्वार्थी लोग उसके विरोधी हो गए ।

साई बुल्लेशाह एक पहुँचेहुए सूफी फकीर हुए हैं । इनकी पवित्र वाणी, निर्मल रहन – सहन एवं ऊँची आध्यात्मिक उपलब्धियों के कारण हिंदू, मुसलमान, सिक्ख आदि पृथक् – पृथक् संप्रदायों , धर्मों के लोग आपसे एक जैसा प्यार करते और स्नेह पाते रहे । साई बुल्लेशाह का वास्तविक नाम अब्दुल्ला शाह था । लोगों के प्यार और प्रसिद्धि के कारण पहले अब्दुल्लाशाह , बुल्लाशाह हो गया, फिर मात्र बुल्ला ही रह गया । आपकी वाणी के आधार पर अंत: साक्ष्य के आधार पर आपके असली नाम का संकेत है –

हुन इक अल्लाह आख के तुम करो दुआई ।
पिया ही सभ हो गया अब्दुला नाहीं ।

विद्वानों में आप शेख- ए- हर- दो आलम ( दोनों लोकों का शेख), मरदे हकानी ( सत्य – परमात्मा का सेवक ), पोशीदा राजों का वाकिफकार ( गुप्त -रहस्यों का जाननेवाला) आदि नामों से बड़े सम्मान से जाने जाते हैं । आपके व्यक्तित्व और वाणी को कई पक्षों से ऊँचा दर्जा प्राप्त है । सूफी संतों – मौलाना रूम, शम्स तबरेज आदि से आपकी वाणी की तुलना की जाती है । पूरे उत्तरी भारत में ( तथा जो अब पाकिस्तान है ) में आपके प्रति बड़ी श्रद्धा और प्रेम के भाव लोगों में आज भी विद्यमान हैं । गुरुग्रंथ साहिब में भी आपकी वाणी संकलित है । इसी से इनकी वाणी की पवित्रता, मानवीयता और सार्वभौमता का परिचय मिल जाता है ।

साई बुल्लेशाह का जीवनकाल प्रायः सन् 1680 से 1757 – 58 तक माना जाता है । आपके जन्मस्थान के संबंध में भी विद्वानों में मतभेद है । कुछविद्वानों का मानना है कि आपका जन्म बहावलपुर रियासत (अब पाकिस्तान) के गाँव उच गलानियाँ में हुआ था । इन विद्वानों का मत है कि बुल्लेशाह के छह महीने की आयु होने तक उनके माता-पिता इसी गाँव में रहते थे। परंतु इसके उपरांत वे गाँव मलकवाल (तहसील साहीवाल ) में चले गए । बाद में पांडोके नाम के गाँव का स्वामी इनके पिता को अपने गाँव की मसजिद में ले आया । उन्हें पांडोके की मसजिद का मौलवी बना दिया तथा गाँव के बच्चों को पढ़ाने का कार्य भी सौंप दिया ।

अधिकांश विद्वान् इस बात से सहमत हैं कि बुल्लेशाह के माता-पिता का पैतृक गाँव उच गलानियाँ ही था । वे लोग वहाँ से पहले मलकवाल में आए और बाद में पांडोके में आ गए ।किंतु कुछविद्वान् मानते हैं कि बुल्लेशाह का जन्म उनके माता-पिता के पांडोके गाँव में आने के पश्चात् हुआ । आज भी यह गाँव ‘ पांडोके भट्टियाँ के नाम से प्रसिद्ध है । यह गाँव कसूर (अब पाकिस्तान) से लगभग चौदह मील दक्षिण – पूर्व दिशा में स्थित एक प्रसिद्ध कस्बा है । इस कस्बे की प्रसिद्धि मुख्यतः बुल्लेशाह के नाम के कारण है ।

यह भी कहा जाता है कि बुल्लेशाह के पूर्वजों में सैयद जलालुद्दीन बुखारी तीन सौ साल पहले मुलतान आए और यहाँ उन्होंने हजरत शेख गौस बहाउद्दीन जकरिया मुलतानी से नाम (गुरुमंत्र) लिया और वे उच गलानियाँ में आकर रहने लगे । बुल्लेशाह के दादा उन्हीं के वंशज थे। अत: सैयद होने के कारण बुल्लेशाह का वंश हजरत मुहम्मद साहब की वंशबेल से जुड़ा हुआ है तथा उसका सूफी- परंपरा से बहुत पुराना संबंध रहा है ।

बुल्लेशाह के पिता शाह मुहम्मद दरवेश अरबी तथा फारसी भाषाओं के तथा कुरानशरीफ के अच्छे ज्ञाता थे। इनकी आध्यात्मिक सोच और पहुँच को लोग बहुत आदर देते थे। अतः बुल्लेशाह पर और बुल्लेशाह की बहन पर उनके विचारों तथा चरित्र का अत्यधिक प्रभाव रहा । बहन भी आजीवन कुँआरी रही और अध्यात्म -भावों में लीन रही । बुल्लेशाह की मजार आज भी पांडोके भट्टियाँ में है । यहाँ हर वर्ष उर्स लगता है । बुल्ले की काफियाँ गाई जाती हैं ।

बचपन की पढ़ाई पिता की देखरेख में गाँव में ही हुई, किंतु बड़ा होने पर उच्च शिक्षा के लिए बुल्लेशाह को कसूर भेजा गया । यहीं इसलामी नियमों के अनुसार वह दीक्षित हुए । उन्हें इसलामी धर्म-ग्रंथों का बड़ा गहरा ज्ञान था । उनके अरबी और फारसी के ज्ञान के उल्लेख भी बहुत मिलते हैं । उनको उच्चकोटि का विद्वान् माना जाता है ।

सैयद अथर अब्बास रिजवी के अनुसार बुल्लेशाह कादरी शतारी के नाम से प्रसिद्ध हैं तथा सत्रहवीं- अठारहवीं शताब्दी के कामिल सूफी फकीर माने जाते हैं ।

इसलाम और सूफी धर्म -शिक्षा, धर्म-ग्रंथों के व्यापक – गहन अध्ययन से बुल्लेशाह में जहाँ गहन संस्कारों का प्रभाव पड़ा, वहाँ परमात्मा को पाने की अपूर्व लौ भी जग गई । अब तो उसे एक कामिल मुर्शिद (पूर्ण सतगुरु) की संगति और मार्गदर्शन की तड़प सताने लगी । इसी ढूँढ़ के दौरान वह हजरत अनायतशाह से मिले । अनायतशाह का डेरा लाहौर में था । वह हजरत मुहम्मद के वंश से संबंधित थे। खेतीबाड़ी तथा बागवानी से रोजी- रोटी कमाते थे ।

बुल्लेशाह ने देखा कि अपने खेत में अनायतशाह प्याज की पनीरी एक स्थान से उखाड़कर दूसरे स्थान पर लगा रहे थे। ऐसा करने से प्याज पैदा होता है । बालक बुल्ला उस समय स्वयं भी अपने पिता का अनुसरण करता हुआ रूहानी शक्ति प्राप्त करने का अभ्यास किया करता था । अनायतशाह का ध्यान प्याजों की गोड़ाई में इतना गहरा लगा हुआ था कि बुल्ले ने निकट ही आम के पेड़ों पर लगे आमों पर दृष्टिपात किया , तो कच्चे आम नीचे गिर गए ।

अनायतशाह ने बुल्ले को देखा तो कहा, ये आम क्यों गिराए हैं ? बुल्ला तो यह चाहता था कि अनायतशाह उससे
बात करें । वह बोला, मैंने न तो पत्थर मारा, न पेड़ पर चढ़ा, मुझे क्या मालूम आम कैसे गिर गए? अनायतशाह की दृष्टि पड़ते ही बुल्ला उनके पाँवों में पड़ गया । अनायतशाह ने उसका नामादि जाना और पूछा, तू क्या चाहता है ? बुल्ले ने कहा, मैं रब ( ईश्वर ) को पाना चाहता हूँ । अनायतशाह ने अत्यंत स्नेह भरे शब्दों में कहा, बुल्लया!

रब दा की पाना, ऐधरों पुटना ते ओधर लाना ।
अर्थात् अपने मन को सांसारिकता से हटाकर अंतर की ओर,

परमात्मा से लगाना । तब से बुल्लेशाह को दिशा मिल गई और सद्गुरु भी मिल गए । बुल्लेशाह पारमात्मिक आनंद की मस्ती में डूबा अपनी काफी ( छंद में ) गाने लगा , जो रंग रंगिया गूढ़ा रंगिया मुरशद वाली लाली ओ यार अर्थात् सतगुरु ने मुझे परमात्मा के प्यार के लाल रंग में , गहरे आत्मिक रंग में रंग दिया है । अब मेरे लिए रब और मुरशिद दोनों एक हो गए हैं । सूफीमत में इस अवस्था का बहुत महत्त्व है । बुल्लेशाह ने अपने मनोभावों को अपने काफियों ( छंदों) में व्यक्त किया है । गुरु अनायतशाह द्वारा स्वीकार कर लिए जाने पर बुल्लेशाह गा उठा

आओ सइओ रल दिओ न बधाई ।
मैं बर पाया रांझा माही ।
अज तां रोज़ मुबारक चड़िया ।
रांझा साडे विहड़े वडिया ।
बुल्ले शाह एक सौदा कीता ।
पीता ज़हर प्याला पीता ।
न कुझ लाहा टोटा लीता ।
दरद दुखां दी गठरी चाई ।

इस पूरी काफी का अर्थ है कि आओ सखियो! मिलकर बधाई का गीत गाओ, क्योंकि मैंने वर ( पति) के रूप में गुरु को प्राप्त कर लिया है, जो प्रभु का ही रूप है, आज का दिन बड़ा मुबारक दिन है, क्योंकि राँझा ( प्रेमी) हमारे हृदयरूपी घर – आँगन में आया है । बुल्लेशाह कहता है कि मैंने प्रभु के साथ सच्चा प्रेम किया है, इस कारण अब मेरे सिर पर दु: खों की गठरी का बोझ आ पड़ा है । मैंने जहर ( दु: ख ) का प्याला जैसे पी लिया है । सूफी मत के अनुसार भक्त को, शिष्य को बड़ी कठिन परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है । अतः यह देखने में टोटे का, घाटे का सौदा हो सकता है,किंतु इसमें परोक्ष रूप में लाभ- ही – लाभ है ।

बुल्लेशाह ने अपने ऊँचे कुल हजरत मुहम्मद के वंश के कुलीन सैयद खानदान का होते हुए अनायत शाह जैसे अराई (छोटी जाति) के मामूली किसान को अपना गुरु बनाया । इससे सब तरफ उनकी बड़ी बदनामी हुई । लोग ताने देते, उलाहने देते –

इश्क असां नाल केही कीती, लोक मरेंदे तान्हे ।
मित्र प्यारे दे कारने नी मैं लोक उल्हाने सहनी हां ।

किंतु बुल्लेशाह बड़ी निर्भयता से गुरु के बताए मार्ग पर दृढ़ता से बढ़ता रहा । वह अपने ऊँचे कुल की मान मर्यादा को भुलाकर हिजड़ों में सम्मिलित होकर नाचने लगता । इतना ही नहीं , लोगों को इस बात की शिक्षा देने के लिए कि जाति या वंश की ऊँच- नीच व्यर्थ है, बुल्ले ने गधियाँ खरीद लीं । बुल्लेशाह को लोग गधियाँवाला कहकर चिढ़ाने की कोशिश करते, किंतु वह तो जानबूझकर समाज में जाति – पाँति और ऊँच-नीच के भेदभाव भरे व्यावहारिक जीवन पर भी चोट करना चाहता था ।

पिता ने जब सुना कि उनका बेटा हिजड़ों के साथ नाचता -गाता है, तब वह क्रोध में भरकर बुल्ले के पास गए । उसके एक हाथ में माला थी, दूसरे हाथ में डंडा । बुल्ले ने नाचना -गाना आरंभ कर दिया –

लोकां दे हथ मालीयाँ ते बाबे दे हथ माल ।
सारी उमर पिट पिट मर गया खुस न सकया बाल ।

पिता भी बुल्ले की मस्ती, रूहानी तेज और करिश्माई प्रभाव के कारण उसके साथ नाचने लगा और ये शब्द गाने
लगा –

पुत्र जिन्हां दे रंग रंगीले मापे वी लैंदे तार ।

अर्थात् जिन माँ – बाप के पुत्र अध्यात्म रग में रंग जाते हैं, वे माता-पिता को भी भव – सागर से पार पहुँचा देते हैं ।

इसी प्रकार की एक अन्य घटना का उल्लेख मिलता है कि बुल्ले के परिवार में विवाह था । उसने अपने गुरु अनायतशाह को भी निमंत्रण दिया । गुरु सैयदों के ऊँचे वंश के अहंकारी भावों का जानते थे। उसने अपने स्थान पर अराई जाति के अपने एक निर्धन शिष्य को विवाह में भेज दिया । वहाँ उसका अपमान हुआ । यह सब जानकर गुरु अनायतशाह अत्यधिक गुस्से में भर गए । एक तरह से बुल्ले तथा उसके परिवार द्वारा यह गुरु का ही अपमान था ।

गुरु ने अपनी सारी आध्यात्मिक शक्ति से बुल्ले को काटकर अलग कर दिया । अपनी आत्मिक शक्तियों का प्रवाह उसकी ओर से मोड़ दिया और अपना चेहरा तक उसे दिखाने से मना कर दिया । बुल्ले के लिए तो यह जीवित रहते मरण के समान था । गुरु के रूठने का अर्थ परमात्मा का रूठना है । उसके लिए तो रोशनी की जगह अब अंधकार छा गया । खुशी और आनंद की जगह गम और मातम छा गया । गुरु ने उससे मुँह मोड़ लिया और डेरे पर आने से भी मना कर दिया ।

सूफी मत के अनुसार यह शिष्य की कठिन परीक्षा के रूप में माना जाता है । न जीते बनता है, न मरते । दिन -रात तड़पते हुए, विरहाग्नि में जलते – झुलसते हुए बीतते हैं , क्योंकि गुरु रास्तेमें ही छोड़ गए । मुझसे ऐसी क्या गलती हुई । बिछोह के तीर छुरियों और तलवारों से भी तीखा दर्द देते हैं ; यह दुःख अत्यंत कष्टकारक है और इसका कोई नियम -विधान नहीं है । एक क्षण के लिए भी आराम नहीं है । हाँ,अनायतशाह चाहें तो दु: ख दूर हो जाए

मैंनूं छड गए लद गए, मैं विच की तकसीर ।
रातों नींद न दिने भुख्ख, अख्खीं पलटिआ नीर ।
छरीयां ते तलवारां कोलों, इश्क दे तिख्खे तीर ।
इश्क जेड न जालम कोई, इह ज़हिमत बिरहों दी पीर ।
बुल्ला शहु जे करे अनायत, दुख होवन तगईर ।

बुल्ला इस वियोग की अग्नि को सहता हुआ पागलपन की हदों तक पहुँच गया । मुर्शिद ( गुरु ) से मिलने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार था । उसे किसी भी भाँति गुरु से मिलना था । उसे ध्यान आया कि अनायतशाह संगीत के बड़े प्रेमी हैं । कहते हैं कि बुल्ले ने स्त्री का वेश बना लिया और नाचने -गानेवाली स्त्री के पास जाकर रहने लगा ।

जब संगीत सीख गया तो प्रतिवर्ष लगनेवाले उर्स में गाने -नाचनेवाली मंडली बनाकर जा पहुँचा । अन्य लोग तो नाचते हुए थककर बैठ गए किंतु बुल्ला नाचता जा रहा था । बड़ी करुण आवाज में अपने हृदय की पीड़ा को गा रहा था । बुल्लेशाह की अधिकांश काफियाँ विरह की पीड़ा को ही विषय बनाकर कही गई हैं । वह नाचता-नाचता बेहोश होकर गिर पड़ा, तब अनायतशाह का मन पसीज गया । उन्होंने निकट जाकर पुकारा, ” ओए तूं बुल्ला ऐं ? बुल्ला उनके पाँवों से लिपटकर रोता हुआ बोला, –

” हुजूर ,मैं बुल्ला नहीं ! भुल्ला हूँ! ” इसके बाद बुल्ले के जीवन में पुनः आध्यात्मिकता के सूखे स्रोत फूट बहे । बुल्ले पर गुरु की कृपा पहले से भी अधिक बरसने लगी । अब बुल्लेशाह पहले से भी अधिक मस्त होकर नाचने- गाने लगा । उसे गुरु के रूप में परमात्मा का दीदार हो गया । अब बुल्ले में और गुरु अनायत — दोनों में कोई भेद नहीं रहा । प्रियतम के साथ एकरूप हो जाने, अद्वैतभाव हो जाने की प्रसन्नता एवं आनंददशा को बुल्लेशाह ने खूब गाया है । सूफी धर्म- परंपरा में मुर्शिद ( गुरु) परमात्मा से एकरूप होता है ।

अत: मुर्शिद के साथ एकरूपता- अभेदता ही ईश्वर के साथ अनेकता में बदल जाती हैं । बुल्लेशाह की काफियाँ इस अद्वैतभाव को इस प्रकार व्यक्त करती हैं –

रांझा रांझा करदी नीं मैं आपे रांझा होई ।
सद्दो नी मैंनू धीयो रांझा हीर न आखे कोई ।
रांझा मैं विच, मैं रांझे विच होर ख्याल न कोई ।
मैं नहीं ओह आप है, अपनी आप करे दिल जोई ।

हीर और राँझा की प्रेम कहानी सर्वविदित है । बुल्लेशाह कहते हैं कि मुझे अब कोई हीर के नाम से नहीं पुकारे । मैं तो राँझा- राँझा पुकारती हुई स्वयं भी राँझा हो गई हूँ । अब राँझा मुझ में और मैं राँझे में मिलकर एक भाव- चित्त हो गए हैं । अब मैं और मेरा वजूद तो रहा ही नहीं । अब तो राँझा ही शेष है । वह स्वयं ही अपना मान-मनौव्वल करताहै ।

इश्क ( प्रेम) की दुनिया में यह एक नई ऋतु का आरंभ है, जो नित नए-नए रूप दिखाती है । बुल्लेशाह कहते हैं कि मनुष्य का शरीर ही ठाकुरद्वारा है, हरिमंदिर हैं । परमात्मा ने अपने रहने के लिए ही इसका निर्माण किया है । ईश्वर ईट -पत्थर के बाहरी मंदिरों, मसजिदों, गिरजाघरों में नहीं रहता । वह तो हाड़ -मांस के बने सजीव प्राणी- देहों में निवास करता है, क्योंकि इन सजीव देवालयों में हजारों नाद एक साथ बजते सुने जा सकते हैं । इन बाहरी धर्म स्थानों पर तो माथा रगड़ते -रगड़ते माथे भी घिस जाते हैं , वेद तथा कुरान पढ़ते – पढ़ते लोग थक जाते हैं, तो भी परमात्मा का दीदार नहीं होता, जबकि इस ठाकुरद्वारे के अंदर उस परमात्मा की नूर – ज्योति सदैव प्रज्वलित रहती है । इस परमात्मा- प्रेम की बहारें ही नित नई – नई हैं –

इश्क दी नवीओं नवीं बहार ।
जां मैं सबक इश्क दा पढिया, मसजिद कोलों जीऊड़ा डरिया ।
डेरे जा ठाकुर दे वडिया, जित्थे वजदे नाद हजार ।
बेद कुरान पढ़- पढ़ थक्के , सजदे करदियां घस गए मत्थे ।
न रब तीरथ न रब मक्के, जिन पाया तिस नूर अनवार ।

सूफी साहित्य में इश्क -मिजाजी ( सांसारिक प्रेम ) के माध्यम से इश्क – हकीकी ( पारमात्मिक प्रेम ) तक पहुँचने की बात कही गई है –

जियर न इश्क – मजाजी लागे , सूई सीवे न बिन धागे ।
इश्क मजाजी दाता है, जिस पिच्छे मस्त हो जाता है ।

मिजाज ( देही) तथा हकीकत ( प्रभु- सत्य) है । अत: देह – रूप सतगुरु का प्रेम ही वह सूई है, जिसके बिना प्रभु-प्रेम का वस्त्र सिया नहीं जा सकता तथा यही प्रभु- प्रेम को देनेवाला है ।

और अंत में एक काफी और उद्धृत करना अति आवश्यक है, जिसमें बुल्लेशाह कहते हैं कि आत्मा परमात्मा में समाकर परमात्मा का ही रूप हो जाती है । द्वैत समाप्त हो जाता है । अद्वैत घटित होता है । सभी बाहरी, सांसारिक, मार्मिक भेदभाव, जात- पाँत, धर्म, संप्रदाय आदि तथा नग्न या ढके होने के, हँसने या रोने के, पाप या पुण्य आदि के भेदभाव आत्मा से निर्लिप्त हो जाते हैं, मुक्त हो जाते हैं –

हिंदू नहीं न मुसलमान,
बहीए त्रिंजण तज अभिमान ।
सुंनी ना नहीं हम शिया,
सुल्हा कुल का मारग लीआ ।
भुख्खे न नहीं हम रज्जे,
नंगे न नहीं हम कज्जे ।
रोंदे न नहीं हम हसदे,
उजड़े न नहीं हम वसदे ।
पापी न सुधरमी न ,
पाप पुंन की राह न जां ।
बुल्लेशाह जो हरि चित लागे ,
हिंदू तुरक दूजन त्यागे ।

कमाल इस बात में है कि सूफी फकीर अपनी निर्मल उदारता में जहाँ बहीए त्रिंजन ( जहाँ स्त्रियाँ इकट्ठी बैठकर सूत कातती है) कहकर सरलतापूर्वक सत्संग करने की एक पारिवारिकता को महत्त्व देते हैं , वहीं शिया – सुन्नि का
विभेद भी व्यर्थसिद्ध करते हैं तथा अल्लाह या रब न कहकर हरि चित लागे कहते हैं और हिंदू-तुरक के द्वैत को, विभेद को त्यागने का आग्रह करते हैं ।

बुल्लेशाह गंगा अवतरण को भी एक काफी में गाते हैं । मानव- आत्मा में परमात्म -चिंतन के अवतरण को लक्ष्य करके कहते हैं –

घर में गंगा आई संतो, घर में गंगा आई ।
आपे मुरली आपे घनइया, आपे जादू राई ।
आपे गोबरीआ, आप गडरिया आपे देत दिखाई ।
अनहद द्वारिका आया गवरीआ कडन दसत चढ़ाई ।

घर (शरीर) में शब्द, नाम रूपी चेतना -गंगा अवतरित हुई है । हृदय – अंतर में ईश्वर के दर्शन हुए हैं । प्रभु ही, कन्हैया ही, यदुवंशी ग्वाला ही, अनहद द्वार का ग्वाला है, जो योगी- रूप धारण करके प्रेम करने, गोवर्धन पर्वत उठानेवाले कृष्ण के रूप में आता है ।

महान् सूफी संत परंपरा का निर्वाह करते हुए संत बुल्लेशाह मानवीय समता एवं इश्क ( प्रेम ) के गीत गाता है । पंजाब के प्रथम सूफी कवि शेख फरीद भी इश्क की स्थापना में गाते हैं , “मैं आज अपने कंत के साथ नहीं सोई, अत: मेरे अंग मुड़ – मुड़ जा रहे हैं । ( ऐ सखियो) जाओ और जाकर किसी दुहागिन से पूछो कि तुम्हारी रात कैसे कटती है? ” इसी प्रकार फरीद के बाद हुए पंजाब के कवि शाह हुसैन भी गाते हैं – “प्रिय के बिना रातें लंबी हो गई हैं … । संत बुल्लेशाह भी अपने कंत के इश्क में डूबा सब कहीं उसका रूप देखता है । वह एक उसे हर कहीं दिखाई देता है

सब इक्को रंग कपाई दा
रूड़ी उत्ते गद्दों चारे
ओह भी वागी गाई दा ।

अर्थात् एक कपास (रुई ) से सभी वस्त्र बनते हैं । सभी रंगों के वस्त्रों को कपास से ही बनाया जाता है । कूड़े के ढेर पर जो व्यक्ति गधों को चरा रहा है, वह गौएँ चराने वालों से भिन्न नहीं है । दोनों एक ही परमात्मा के बंदे हैं । एक ही अल्लाह की संतान हैं

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