रामकृष्ण परमहंस : अध्यात्म महानदी की समृद्धि और वेग – प्रवाह

रामकृष्ण परमहंस बचपन में गदाधर कहलाए इस बालक का जन्म 18 फरवरी, 1836 को बंगाल प्रांत के एक छोटे से गाँव कुमारपुकुर में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ । माता-पिता अत्यंत दरिद्र किंतु धर्मपरायण थे। राम के परम उपासक थे । पिता क्षुदीराम चटर्जी साठ वर्ष की आयु में यात्रा पर गए तो वहाँ रात्रि में भगवान् स्वप्न में आए । उन्होंने कहा, मैं विश्व की मुक्ति के लिए शीघ्र ही पुनः जन्म धारण करूँगा । गया में भगवान् विष्णु का पदचिह्न अंकित है । तभी इधर कुमारपुकुर में उनकी पत्नी चंद्रमणि को भी स्वप्न में कि कुटिया के सामने के शिव मंदिर में स्थित शिव की मूर्ति सजीव हो उठी है । उसके भीतर से एक प्रकाश-किरण चंद्रमणि की देह में प्रविष्ट हो गई । चंद्रमणि मूर्च्छित हो गई। बाद में होश आने पर उसने पाया कि वह गर्भवती है ।

जागृति मानवीय जीवन की प्रथम पहचान है, जो आंतरिकता, आत्मिकता के धरातल पर घटित होती है । भारतीय जाति (राष्ट्र) रही थी कभी जाग्रत्, सचेत और सक्रिय, किंतु अब हर प्रकार से सुसुप्ति में दफन या नींद में बड़बड़ाती सी प्रतीत होती है । भारतीय ऋषियों ने एक समय चार युगों की पहचान कराते हुए कहा था कि सोया हुआ होना कलयुग है, जाग जाना द्वापर, उठकर खड़े होना ‘त्रेता तथा चल देना सतयुग होता है ।

आज भारतीय लोग सबकुछ को पीठ देकर, भुलाकर सोए हुए हैं ।किंतु इस निद्रा में भी उनके अतीत की जागृति समाई हुई है, क्योंकि वह एक जीवित जाति है, मृत नहीं । उसके पास अपना एक समृद्ध- चैतन्य अतीत है, जिसमें मध्ययुगीन संतों की वह सुदीर्घ देश-व्यापी आध्यात्मिक महानदी वाहित है, जो समूचे विश्व मानव को तृप्ति प्रदान करती आ रही है । इन्हीं अध्यात्म महानायकों में आधुनिक भारत में रामकृष्ण परमहंस भी हैं, जिन्होंने अध्यात्म महानदी की समृद्धि और वेग – प्रवाह में अपना अक्षुण्ण योगदान किया है ।

बचपन में रामकृष्ण बड़े चंचल, हँसमुख और नटखट थे । छह वर्ष की आयु में 1842 के जून – जुलाई महीनों में अपने वस्त्र के पल्लू में लाई लिये खाते हुए खेतों में उन्मुक्त घूम-फिर रहे थे। तभी धान के खेतों की पगडंडी पर गुजरते हुए आकाश पर उनकी नजर पड़ी तो देखा कि जल से भरी श्यामल मेघ – घटा ऊपर उठ रही है । देखते -ही – देखते सारा आकाश मेघाच्छन्न हो गया । तभी सफेद सारसों की एक पंक्ति बादलों को छूती हुई उनके सिर के ऊपर से होती हुई गुजरी । वह दृश्य अपने सौंदर्य में इतना रोमांचकारी था कि बालक अपनी सुधबुध खो बैठा । बेहोश होकर धरती पर गिर पड़ा । लाई इधर -उधर बिखर गई । उधर से गुजरते किसी ने उसे देखा । गोदी में उठाकर उसे उसके घर पहुंचा दिया ।

इस प्रथम भावावेश की दशा में रामकृष्ण को आंतरिक, सहज कलात्मक सौंदर्य की अनुभूति हुई, जो उन्हें एक दिव्य प्रभाव से भर गई ।

भगवान के साथ यह उसका प्रथम मिलन था । भीतर एक जागृति घटित हुई। इस प्राकृतिक दृश्य – घटना में भगवान् का सौंदर्य देखकर सहज ही आनंद-विह्वल हो जाने का स्वाभाविक मार्ग खुल गया । रामकृष्ण समस्त पदार्थों में भगवान् के सुंदर रूप को देखते और मुग्ध हो जाते । आठ वर्ष का होते – होते एक बार पुनः शिवरात्रि के अवसर पर वह शिव की पावन भूमिका निभा रहे थे, तभी अचानक वह स्वयं शिव- भाव में इतना गहरा डूब गए कि उनके दोनों गालों पर से होकर खुशी के अश्रुओं की अविरल धाराएँ बहने लगीं । उसी आनंदानुभूति के अतिरेक में वह संज्ञाहीन हो गए । लोग सोचने लगे कि रामकृष्ण की मृत्यु हो गई है । इस प्रकार भावावेश अवस्था में होने की घटनाएँ बाद में जल्दी – जल्दी घटने लगीं ।

कलकत्ता से छह किलोमीटर की दूरी पर दक्षिणेश्वर के सुप्रसिद्ध काली -मंदिर में श्रीरामकृष्ण के बड़े भाई रामकुमार प्रथम पुजारी नियुक्त थे । इसी मंदिर में रामकृष्ण भी सहायक पुजारी नियुक्त हुए । वह काली माता की मूर्ति के सामने घंटों बैठे रहते और निरंतर माँ – माँ पुकारते तथा रोते रहते ।

1859 में छह वर्ष की कन्या से उनका विवाह हुआ, तब वह तेईस वर्ष के थे ।किंतु वह तो काली माँ की भक्ति- पूजन में बैठते तो ऐसी सुधबुध खो बैठते कि अपने ही सिर पर फूल चढ़ाने लगते । काली -मंदिर में साधु – संन्यासियों का आना- जाना सदा लगा रहता । वहीं तोतापुरी आकर ग्यारह महीने रहे । उन्होंने श्रीरामकृष्ण को वेदांत सुनाया । इससे पूर्व भैरवी ब्राह्मणी ने उन्हें अनेक तंत्रोक्त साधनाएँ कराई थीं । इन सबका सम्मिलित प्रभाव इतना गहरा हुआ कि उनमें भगवान् के लिए पागलपन की सभी हदें पार हो गई ।

वह एक ईश्वरादिष्ट मसीहा की भाँति बोलते और कई बार भावसमाधि में डूब जाते । उनकी देह नि : स्पंद हो जाती, श्वास- प्रश्वास रुक जाते , आँखें स्थिर हो जाती, समस्त ऐंद्रिक चेतना लुप्त हो जाती और वे ईश्वर की चेतना से भर जाते । “(रामा रोलाँ) । माँ पर अपने अगाध विश्वास को वह अपने बँगला गीत में गाते थे

दुर्गा दुर्गा अगर जपूँमैं, जब मेरे निकलेंगे प्राण ।
देखू कैसे नहीं तारती, कैसे हो करुणा की खान ॥

विभिन्न धर्म- संप्रदायों के प्रति रामकृष्ण का गहरा आदरभाव था । उन्होंने स्वयं अपने शिष्यों को बताया – “मैंने हिंदू, मुसलमान, ईसाई सभी धर्मों का अनुशीलन किया है, हिंदूधर्म के विभिन्न संप्रदायों के भिन्न -भिन्न पथों का भी अनुसरण किया है…मैंने देखा है कि सबके कदम उसी एक भगवान् की तरफ ही बढ़ रहे हैं, यद्यपि उनके पथ भिन्न-भिन्न हैं ।… एक ही राम के सहस्र नाम हैं । एक ही तालाब के अनेक घाट हैं ।”

वह अपने परम शिष्य नरेंद्र (विवेकानंद) तथा अन्य शिष्यों से साधना के संबंध में उपदेश देते — “चर्मचक्षु से उन्हें (ईश्वर को) कोई नहीं देख सकता, साधना करते – करते शरीर प्रेम का हो जाता है, आँखें प्रेम की , कान प्रेम के । उन्हीं आँखों से वे दीख पड़ते हैं , उन्हीं कानों से उनकी वाणी सुनाई पड़ती है।…ईश्वर को खूब प्यार किए बिना दर्शन नहीं होते । खूब प्यार करने से चारों ओर ईश्वर- ही – ईश्वर दीखते हैं ।”

सामाजिक लोगों के लिए उनकी सलाह थी कि संसार में चींटी की तरह रहो । इस संसार में नित्य और अनित्य दोनों मिले हुए हैं । बालू के साथ शक्कर मिली हुई है । चींटी बनकर चीनी का भाग ले लेना । उनकी मान्यता थी कि हमें छोटे – छोटे प्राणियों की ओर भी ध्यान देना चाहिए, केवल मनुष्य को देखने से काम नहीं चलेगा ।

उनका विश्वास था कि विश्वात्मा अव्यय, परम ब्रह्म से भिन्न व पृथक् किसी वस्तु का अस्तित्व नहीं है तथा मनुष्यों की पवित्रता से ही स्थानों की पवित्रता होती है, अन्यथा कोई स्थान मनुष्य को किस तरह पवित्र बना सकता है? और अंततः वह कह उठे, ” इस विपिन में वंशी बज रही है । मैं वहाँ बिना जाए नहीं रह सकता । मेरे प्यारे पथ में खड़े मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं ।… ओ मेरी आत्मा! अंतस्तल में निमग्न हो जा! सौंदर्य के सागर में डूब जा ! तुम्हें रत्न – प्रेम रत्न – प्राप्त होगा! ” और अपने इन शब्दों में गूंजती ध्वनि व चेतना का अनुसरण करते हुए गले की भयंकर पीड़ा को भुलाकर अपने प्रिय शिष्य नरेंद्र (विवेकानंद) को सामने बिठाकर आशीर्वाद देकर रामकृष्ण 15 अगस्त, 1886 को विश्वात्मा में विलीन हो गए ।

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