स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद : विश्व को अध्यात्मवाद के चरणामृत का पान कराया

“आध्यात्म – विद्या, भारतीय दर्शन एवं धर्म के बिना विश्व अनाथ हो जाएगा ।” इस प्रकार की दृढ़ भावना रखने वाला परतंत्र भारत का ही एक सन्यासी था, जिसने समस्त जगत को भारत के अध्यात्मवाद के चरणामृत का पान कराया और विदेशों मे भारत का मस्तक ऊंचा किया जिसका नाम था स्वामी विवेकानंद ।

स्वामी विवेकानंद का जन्म 

जन्म से नरेंद्रदत्त और बाद मे स्वामी विवेकानंद के नाम से जगविख्यात भारतीय नव – जागरण के इस अग्रदूत श्री स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी, 1863 को कलकत्ता मे श्री विश्वनाथ दत्त के घर मे हुआ ।  विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाई कोर्ट के प्रसिद्ध वकील थे ।

मेधावी बालक नरेंद्र सन् 1879 में मेट्रिक उत्तीर्ण कर कलकत्ता के ‘जनरल असेंबली’ नामक कालिज मे प्रविष्ट हो गया । कालिज में रहकर नारेंडरे इतिहास, साहित्य, दर्शन, आदि विषयों का अध्ययन किया । अंत में बी। ए। की परीक्षा उत्तम श्रेणी में उत्तीर्ण कर ली।

अपने छात्र जीवन में वे उन हिंदू युवकों के साथी थे, जो यूरोप के उदार एवं विवेकशील चिंतकों की विचारधारा पर अनुरक्त थे तथा जो ईश्वरीय सत्ता एवं धर्म को शंका की दृष्टि से देखते थे । वे जिज्ञासुवृत्ती के थे । ईश्वरीय सत्ता के अस्तित्व की जिज्ञासा  लेकर वे ब्राह्मसमाज में गए । उन्होंने केशचंद्र सेन तथा महर्षि देवेंद्रनाथ ठाकुर के  उपदेश सुने, पर जिज्ञासा शांत न हुई । अनेक धर्म-गुरुओं के संपर्क में होते हुए अंत मे नरेंद्र सत्तरह वर्ष की आयु में दक्षिणेश्वर के रामकृष्ण परमहंस के मंत्र से अनुप्राणित हुए । परमहंस जी का नरेंद्र पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा।

स्वामी विवेकानंद
स्वामी विवेकानंद

नरेंद्र की शिक्षा – शिक्षा 

नरेन्द्रनाथ का शरीर काफ़ी एवं हृष्ट पुष्ट था । स्वामी विवेकानंद बचपन से ही कुश्ती, बॉक्सिंग, दौड़, धोड़दौड़ के प्रेमी और इन खेलों में दक्ष थे । वे संगीत के प्रेमी और तबला बजाने में सिद्धहस्त थे । उनका स्वभाव पौरुष के वेगों से उच्छल एवं उद्दाम थे और आरंभ से ही उनके भीतर राजसिकता के भाव थे । वे संस्कृत और अंग्रेजी के उद्भट विद्वान एवं यूरोप के तार्किको एवं दार्शनिकों को विद्याओं में परम निष्णांत थे ।  

परमहंस स्वामी विवेकानंद के समीप आकार उनके विचार परिवर्तित होने लगे । नरेंद्र ने उन्हें अपना दीक्षा गुरु बना लिया । इसी बीच नरेंद्र के पिताजी का देहावसान हो गया और परिवार का दायित्व ऊअनके कंधों पर आ गया । उन्होंने अच्छी नौकरी तलाश की, किन्तु नौकरी न मिली । उन्हे बहुत दुख हुआ ।

परमहंस रामकृष्ण के संपर्क मे 

वे पुनः भगवान अस्तित्व पर शंका करने लगे । इन शंकाओं में डूबा हुआ नरेंद्र पुनः गुरु की शरण मे आ गया और विनती के – “आप मेरे लिए काली माता से वरदान मांगे कि मेरा आर्थिक संकट दूर हो जाए।”

परमहंसने कहा – “माता से जो माँगता है, तू स्वयं निःसंकोच मांग ले, वे तेरे दु:खों को जानती है।”

वहाँ से नरेंद्र मंदिर मे गए और काली से धन की बात भूलकर उन्होंने भगवान के दर्शनों के लिए बुद्धि  और भक्ति की याचना की ।

स्वामी विवेकानंदने अनेक बार संन्यास लेने का विचार गुरु के सम्मुख प्रकट किया, किन्तु परमहंस जी उचित अवसर न समझ इन्कार करते रहे । अंत में एक दिन उपयुक्त अवसर देख रामकृष्ण परमहंस ने अपनी साधना का तेज और अपनी अद्रश्य दर्शिनी दृष्टि को स्वामी विवेकानंद के ह्रदय में उतार कर उसे ‘विवेकानंद’ बना दिया ।

रामकृष्ण और नरेन्द्रनाथ का मिलन श्रद्धा और बुद्धि का मिलन था, रहस्यवाद और बुद्धिवाद का मिलन था ।

श्री रामकृष्ण का देहावसान और विवेकानंद के लक्ष्य 

सन् 1886 ई में श्री रामकृष्ण परमहंस का देहावसान हो गया । त्तपश्चात्  स्वामी विवेकानंद कलकत्ता छोड़ उत्तर में स्थित वराद नगर के आश्रम में आकार निवास करने लगे। वहाँ उन्होंने दर्शन एवं अन्य शस्त्रों और धर्म – ग्रंथों का अध्ययन किया ।

दो वर्ष तपस्या और अध्ययन के उपरांत विवेकानंद समस्त भारत की यात्रा पर चल पड़े । इस यात्रा में स्वामी जी ने निम्नलिखित तीन कार्यों को अपना लक्ष्य बनाया –

  • बुद्धिवादी समाज में धर्म के प्रति जो अश्रद्धा उतत्पन्न हो गई थी, उसको दूर करके धर्म की एक तर्क – संगत व्याख्या प्रस्तुत करना, जो मानव के सांसारिक कृत्यों में बाधक न हो ।
  • हिंदू धर्म पर, कम से कम यूरोपीय विद्वानों द्वारा असमार्थित धर्म और इतिहास पर अविश्वास करने वाले हिंदुओं मे स्वधर्म के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करना ।
  • भारतीयों को आत्म गौरव की भावना से प्रेरित करना एवं उन्हे भारतीय संस्कृति, इतिहास और आध्यात्मिक परंपराओं का योग्य उत्तराधिकारी बनाना ।

उन्होंने शक्ति की साधना में ही भारत का कल्याण बताया । उनका कहना था, ‘शक्ति, पौरुष, क्षात्र वीर्य और ब्रह्म तेज, इनके समन्वय से भारत की नई शिक्षाएँ भी धर्म से निकाली एवं रुद्र शिव तथा महाकाली को लोगों का आराध्य बना दिया । साथ ही यह भी उपदेश दिया, वास्तविक शिव की पूजा निर्धन और दरिद्र की पूजा मे है, रोगी और कमजोर की पूजा में है ।

कहीं कहीं तो वे भारत के दारिद्रय और दिन हीन दशा पर ईश्वर से भी विद्रोह करते दिखाई देते है, “मेरे जीवन का परम ध्येय उस ईश्वर के विरुद्ध संघर्ष करना है, जो परलोक में आनंद देने के बहाने इस लोक में मुझे रोटियों से वंचित रखता है, जो विधवाओं के आँसू पोंछने मे असमर्थ है, जो माँ-बाप से बोने बच्चे के मुख में रोटी का टुकड़ा नहीं डए सकता।”

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