महाराणा प्रताप

महाराणा प्रताप : चित्तौड़ की स्वाधीनता के लिए जूझते रहे

स्वाभिमानी और स्वतंत्रता के पुजारी : महाराणा प्रताप

अपने जीवन को मातृभूमि की स्वतंत्रता रूपी बलिवेदी पर सहर्ष निछावर करे वाले भारतीय सपूतों में महरान प्रताप का नाम अग्रणी है । अकबर के शासनकाल में जब अनेक हिंदू राजा महाराजा मुगलों की आधीनता स्वीकार कर चुके थे, तब अकेले महाराणा प्रताप ही ऐसे ओजस्वी एवं स्वाभिमानी राणा थे, जो जीवन की अंतिम साँस तक जन्मभूमि चित्तौड़ की स्वाधीनता के लिए जूझते रहे । अकबर उनकी वीरता का लोहा मानता था । महाराणा प्रताप के प्रति श्रद्धा करते हुए कवि ने ठीक ही कहा है –

माई एहडा पूत जन, जेहड़ा राणा प्रताप ।
अकबर सूतो ओझके, जाण सिराणे साँप ।।

इस स्वदेशाभिमानी और स्वतंत्रता के पुजारी का जन्म 3 मई,1539 ई. को हुआ था । इनके पितामह मेवाड़ – मुकुट वीरता के अवतार महाराणा सांगा और पिता महाराज उदयसिंह थे। उदयसिंह में उस वीरता और आत्मगौरव का अभाव था, जो महाराणा सांगा में विद्यमान थी । महाराणा प्रताप में अपने पितामह की वीरता और देश-प्रेम की भावना पल्लवित हुई । उन्हे अपने पिता के दुर्बलता पर खेद था । वे कहा करते थे की “यदि मेरे और मेरे पितामह मे मध्य मेरे पिता न आए होते तो दिल्ली चित्तौड़ के चरणों मे होता ।”

बचपन से ही देश भक्त और वीरता 

प्रताप ने अपनी योग्यता, वीरता और देशभक्ति की भावना का परिचय बचपन से ही देना शुरू कर दिया था । परिणाम यह हुआ की पिता की इच्छा न होने पर भी सामंतों ने इन्हे मेवाड़ का महाराणा बनाया । मेवाड़ का सिंहासन उस समय वास्तव में काँटों की शय्या थी । राजय के बहूत बड़े भाग पर मुसलमान अधिकार कर चुके थे । दिल्लीपति अकबर से टक्कर लेने की भूमिका थी मेवाड़ का महाराणा बनना । प्रताप ने इसे सहर्ष स्वीकार किया ।


प्रताप के पास अकबर जैसे कूटनीतिज्ञ एवं शक्तिशाली बादशाह से लड़ने के लिए न पूरे साधन थे न धन भी था । फिर भी उन्होंने निश्चय किया की, “जब तक देश का उद्धार नहीं होगा, तब तक राजमहालों का त्याग करके जंगलों में रहूँगा, पलंग छोड़ कर तृणों की शैया पर सोऊँगा । और षटरस भोजन जंगली कंद फल, मूल का आहार करूंगा।” इस द्रढ निश्चय, त्याग और कष्ट सहन से प्रताप के मन में पर्वतों को हिला देने और तूफ़ानों का सामना करने की शक्ति उत्पन्न हो गई ।


अकबर ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर अच्छे से अच्छे सेनापतिओ के नेतृत्वमे बड़ी बड़ी सेना भेज कर महाराणा प्रताप को पराजित करने का प्रयत्न किया, किन्तु उसे सफलता नहीं मिल सकी । हल्दीघाटी का युद्ध इस प्रसंग की सबसे मुख्य घटना है ।

महाराणा प्रताप का शौर्य : हल्दीघाटी युद्ध का प्रसंग 

एक और अकबर के सेनापति मानसिंह के नेतृत्वमें एक लाख यवन सैनिक और दूसरी और देश – देश प्रेम के मत वाले महाराणा के बीस हजार योद्धा । महाराणा प्रताप का शौर्य देखने योग्य था । वे मानसिंह के रक्त के प्यासे सिंह के समान शत्रु सेना पर टूट पड़ते थे। अवसर पाकर उन्होंने मानसिंह के हाथी को घायल करके, मानसिंह पर भाला मारा । मानसिंह ने हौदे के नीचे छिपकर प्राण बचाए । इधर प्रातप पर चारों और से यवन देश सेना टूट पड़ी । प्रचंड वीरता दिखाने पर भी वे घायल हो गए। महाराणा के प्राणों को संकट में पड़ा देख नरेश वहाँ पहुंचे। और प्रताप का राजमुकुट अपने शिर पर रखकर वह युद्ध करने लगे। यवन सेना उन्हें ही प्रताप समजकर युद्ध करते रहे। और प्रताप को युद्ध से हट जाने का अवसर मिल गया।

हल्दीघाटी युद्ध का वर्णन करते हुए श्यामनारायण पांडे लिखते है –

धड़ कही पड़ा, शिर कही पड़ा,
कुछ भी उनकी पहचान नहीं,
शोणित का ऐसा वेग बड़ा
मुर्दे बह गए निशान नहीं।

मेवाड़ केसरी देख रहा,
केवल रण का ना तमाशा था।
वह दौड़-दौड़ करता था रण,
वह माँ रक्त का प्यास था।

शक्ति सिंह का देश निर्वासन 

राणा प्रताप ने एक बार ब्राह्मण वध के अपराध में अपने छोटे भाई शक्ति सिंह को देश निर्वासन का दंड दिया था तो वह अकबर से जा मिला। महाराणा को युद्ध भूमि से बाहर जाते हूए शक्तिसिंह ने देख लिया और वह बदला लेने के विचार से उनका पीछा करने लगा।

दो मुगल सैनिक भी प्रताप का पीछा कर रहे थे । सहसा शक्ति सिंह के ह्रदय में भातृप्रेम का भाव उमड़ा। उसने यवनों को मौत के घाट उतारा और महाराणा के सन्मुख जाकर क्षमा याचना की। प्रताप का स्वामीभक्त घोडा चेतक दम तोड़ चुका था। वे शक्ति सिंह का घोडा लेकर सुरक्षित स्थान के लिए चले गए।

अपूर्व साहसी, अतुल पराक्रमी, प्रचंड शौर्ययुक्त, हिमाद्रि सदृश्य धीरता और द्रढता से युक्त, स्वदेशाभिमानी, तपस्वी, रण-कुशल, द्रढ प्रतिज्ञ एवं मातृभूमि की गौरव गरिमा और स्वाधीनता की रक्षा हेतु अपने युग के सर्वाधिक शक्तिशाली साम्राज्य की शक्ति से अकेले ही जूझने – टकराने वाले अमर सेनानी महाराणा प्रताप की चेतक पर सवार विशाल कांस्य प्रतिमा राजस्थान के स्वर्ग उदयपुर के मोती नगरी में स्थित है। गहनों से सजे धजे चेतक का तीन पाँव पर खड़ा होना जहाँ अत्यंत शोभनीय है, वहाँ प्रताप की कमर में लटकती तलवार, हाथ का भाला और युद्ध पोशाक में वीरता टपकती है। द्वार पर ये शब्द अंकित है, “जो राखे द्रढ धर्म को, तेहि राखे करतार।”

महाराणा प्रताप का बलिदान और यह स्मारक शताब्दियों तक पतितों, पराधीनों और उत्पीड़ितों के लिए प्रकाश स्तम्भ रहा है और आगे भी रहेगा। चित्तौड़ की उस पवित्र भूमि में युगों तक मानव स्वराज्य एवं स्वधर्म का अमर संदेश झंकृत होता सुना जा सकता है।

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