छायावाद

छायावाद जीवन की परोक्ष अनुभूति है। यह रहस्यवाद की पूर्व स्थिति है।


द्विवेदी युग के पश्चात हिंदी साहित्य में जो कविता धारा प्रवाहित हुई, वह छायावादी कविता के नाम से प्रसिद्ध हुई। वस्तुतः छायावाद इस युग के इतनी प्रमुख प्रवृत्ति रही है की सभी कवि उससे प्रभावित हुए और उसी के नाम पर युग का नया नामकरण कर दिया।


छायावाद अपने युग की अत्यंत व्यापक प्रवृत्ति है। फिर भी यह देखकर आश्चर्य होता है की उसकी परिभाषा के संबंध मे विचारक एकमत नहीं। विभिन्न विद्वानों के छायावाद की भिन्न-भिन्न परिभाषाएं इस प्रकार है –

“छायावाद एक शैली विशेष है, जो लाक्षणिक प्रयोगों अप्रस्तुत विधानों और अमूर्त उपमानों क लेकर चलती है” – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल


“छायावाद जीवन की परोक्ष अनुभूति है। यह रहस्यवाद की पूर्व स्थिति है।” – डॉ रामकुमार वर्मा


“छायावाद प्रकृति के बीच जीवन का उदगीथ है।”
– महादेवी वर्मा


“स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह छायावाद है।” – डॉ नगेन्द्र

हिंदी के प्रमुख छायावादी कवि है – सर्वश्री जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ तथा महादेवी वर्मा। अन्य कवियों में डॉ. रामकुमार वर्मा, भगवतीचरण वर्मा, उदयशंकर भट्ट, नरेंद्र शर्मा, रामेश्वर शुक्ल, ‘अंचल’ के नाम उल्लेखनीय है।


छायावादी काव्य की विशेषताएँ निम्नलिखित है –

(1) सौन्दर्य भावना – छायावाद की प्रमुख प्रवृत्ति है सौन्दर्यानुभूति। मानव के आंतरिक सौन्दर्य का उद्घाटन प्रकृति के माध्यम से हुआ। अतः छायावादी कविता में प्राकृतिक सौन्दर्य को विशेष महत्व मिला।

शशि मुख पर घूँघट डाले, अंचल में दीप छिपाए।
जीवन की गौधूलि में, कौतूहल से तुम आए।।
(प्रसाद)

(2) प्रेमभावना – छायावादी काव्य प्रेम भावना का विकास विविध रूपों में हुआ। जैसे प्रकृति प्रेम, नारे प्रेम, मानव प्रेम, आध्यात्मिक प्रेम।


यह तीव्र ह्रदय की मदिरा, जी भरकर छक करे मेरे,
अब लाल आंखे दिखलाकर, मुझको ही तुमने फेरी । (प्रसाद)

(3) मानवतावादी दृष्टिकोण – छायावादी काव्य में रवींद्र और अरविन्द की मानवतावादी दृष्टि का विकास हुआ।

मानव तुम सबसे सुंदरतम (पंत)

(4) जीवन के बदलते पहलुओं की अभिव्यक्ति – आचार्य हजारिप्रसाद द्विवेदी के अनुसार इन कवियों में, “मानवीय आचारों, क्रियाओं, चेष्टाओं और विश्वासों के बदले हुए और बदलते हुए मूल्यों को अंगीकार करने की प्रवृत्ति थी।”

धर्म, नीति और सदाचार का मूल्यांकन है जनहित,
सत्य नहीं वह, जनता से जो नहीं प्राण समन्वित। (पंत)

(5) रहस्य भावना  – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में, “कवि उस अनंत और अज्ञात प्रियतम की आलंबन बनाकर अत्यंत चित्रमयी भाषा में प्रेम की अनेक प्रकार से अभिव्यंजना करते है।” तथा ‘छायावाद का एक अर्थ रहस्यवाद भी है।” अतः सभी आलोचक रहस्यवाद को छायावाद का प्राण मानते है।


प्रिय चिरंतन है सजनी,क्षण क्षण नवीन सुहागिनी मैं । महादेवी वर्मा

(6)  तत्त्व चिंतन – छायावादी कविता में अद्वैत दर्शन, योग दर्शन, विशिष्टाद्वैतवाद, आनंदवाद आदि तत्वों का दार्शनिक चिंतन मिलता है। जैसे प्रसाद का मूल दर्शन आनंदवाद है, तो महावेदी ने अद्वैत, सांख्य एवं योगदर्शन का विवेचन अपने ढंग से किया है।

(7) वेदना की युगानुरूप विवृती – छायावादी कविता मे वेदना की अभिव्यक्ति करुणा और निराशा के रूप में हुई है, किन्तु प्रसाद और महादेवी की वेदनाभूति में निराशा का अंधकार एवं भौतिक दु:खों का धुंधलापन नहीं।

चीर पूर्ण नहीं कुछ जीवन में
अस्थिर है रूप जगत का मद ।

(8) विज्ञान का प्रभाव – वैज्ञानिक युग में बौद्धिक प्रक्रिया का प्राधान्य होने के कारण विज्ञान मानव संस्कृति की चेतन का इतिहास बना। शक्ति के संचार और मानवता की विजय की कामना बलवती हुई।

तांडव में थी तीव्र प्रगति, परमाणु विफल थे।
नियति विकर्षणमयी, त्रास से सब व्याकुल थे।।

(9) देश प्रेम एवं राष्ट्रीय भावना – छायावादी कविता में देश प्रेम और राष्ट्रीयता की भावना अनेक रूपों में विकसित हुई।

मझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर तुम देना फेंक।
मातृभूमि पर शीश बढ़ाने, जिस पथ जावें वीर अनेक ।। – माखनलाल चतुर्वेदी

(10) शृंगारिकता का प्राधान्य – छायावादी काव्य विशुद्ध सौंदर्यवादी और प्रेमवादी काव्य है।

नील परिधान बीच सुकुमार, खिल रहा मृदुल अधखुला अंग।
खिला हो ज्यों बिजली का फूल, मेघ बन बीच गुलाबी रंग।। – प्रसाद

(11) वैयक्तिक चिंतन – छायावादी कविता वैयक्तिक चिंतन और अनुभूति की परिधि में सीमित होने के कारण अंतर्मुखी हो गई, कवि के ‘अहं’ में निबद्ध हो गई। दूसरी और कवियों ने काव्य में अपने सुख- दु:ख, उतार चढ़ाव,आशा-निराश की अभिव्यक्ति खुल कर की। बच्चन का ‘आज मुझे से दूर दुनिया’ इसका परिचायक है।

कलापक्ष – कलापक्ष की दृष्टि से छायावादी कविता में गीति तत्व का विकास हुआ। प्रतीकों की छठा यहाँ दर्शनीय है। बिम्ब विधान का यहाँ बहुलता से प्रयोग हुआ है।

कलापक्ष का जितना उन्नयन छायायादी काल में हुआ, वह अद्वितीय है। छंद, शब्द योजना, शब्द संस्कार, शैली अलंकरण आदि सभी क्षेत्रों में क्रांति आई।

भाषा में माधुर्य गुण का समावेश हुआ। उससे अर्थवत्ता बढ़ी, कोमलता आई, मुखरचित्र प्रस्तुत करने की क्षमता आई। नए नए शब्दों का निर्माण हुआ। भाषा का रागात्मक रूप और संगीत सौन्दर्य मिला। लाक्षणिकता, ध्वन्यात्मकता, वचनवक्रता, चित्रमयता आदि गुणों का समावेश हुआ।

नए नए छंद आए। पुराने छंदों का संस्कार हुआ। यहीं नहीं, छंदों से मुक्ति भी भा गई। प्राचीन अलंकारों का त्याग हुआ। नए अलंकारों का प्रवेश हुआ। कविता आंतरिक सौन्दर्य से विभूषित हुई। घिसे पिटे उपमान छोड़कर नए प्रतीकों को अपनाया गया।

शीतल ज्वाला जलती है। ईंधन होता दुग जल का।
वह व्यर्थ साँस चल कर। करती है काम अनिल का।। – प्रसाद

छायावादी कविता अपने अभिव्यतकी पक्ष मे पुष्ट और महत्वपूर्ण रहने के आकर्षण से छायावाद की ‘शैली विशेष’ कहकर पुकारा गया।

झर चुके तारक-कुसुम जब। रश्मियों के रजत पल्लव
संधि में आलोकतम की। क्या नहीं नभ जानता तब
बार से अज्ञात वासंती। दिवस रथ चूल चुका है। – महावेदी (दीपशिखा)

छायावादी काव्यधारा की भी कुछ अपनी सीमाएं है, जिनके कारण सन 1935 के बाद यह काव्यधारा क्षीण होती गई।

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