शिक्षा

शिक्षा का अर्थ, प्रत्यय और कार्य

शिक्षा के द्वारा मानव का बौद्धिक विकास होता है। उचित-अनुचित का ज्ञान होता है। विकास की अवस्थाओं की आधारशिला शिक्षा है। समाज या राज्य शि क्षा की व्यवस्था व्यक्ति एवं समाज सभी के उत्थान के लिए करता है। इससे नैतिक एवं  चारित्रिक मूल्यों का विकास होता है। मानव के विकास का साधन है शिक्षा।  शि क्षा के द्वारा मानव की मूल शक्तियों का विकास मानव के ज्ञान में वृद्धि एवं मानव के व्यवहार में परिवर्तन किया जाता है। शिक्षा मनुष्य को सभ्य एवं सुसंस्कृत नागरिक बनने में सहायता करती है।

शिक्षा का कार्य मनुष्य के जन्म के साथ ही प्रारंभ हो जाता है। बच्चे के माता-पिता परिवार के अन्य सदस्य जन्म के कुछ दिन बाद से ही बालक को सुनना और बोलना सिखाने लगते हैं।  जैसे-जैसे बालक बड़ा होता है, वह उठना-बैठना चलना और बोलना सीखने लगता है,  बालक अन्य सामाजिक आचरण सीखना भी परिवार में ही प्रारंभ कर देता है।  बालक  कुछ और बड़ा होने पर पढ़ना लिखना सीखने लगता है।

चार-पांच वर्ष की अवस्था  में बालक विद्यालय जाना प्रारंभ कर देता है। विद्यालय में बालक की सुनियोजित  ढंग से शिक्षा दी जाती है। विद्यालय के साथ-साथ समाज और परिवार भी बालक को सुनिश्चित ढंग से शिक्षा देते रहते हैं और यह क्रम जीवन भर चलता रहता है। इस तरह हम कह सकते हैं कि समाज बालक को जन्म से लेकर मृत्यु तक विभिन्न प्रकार की शि क्षा देता रहता है। अतः शि क्षा, जीवन भर सप्रयोजन चलने वाली एक  प्रक्रिया है। 

शिक्षा का शाब्दिक अर्थ

शब्द ‘शिक्षा’ शब्द संस्कृत भाषा  के  ‘शिक्ष’ शब्द धातु से बना है । शिक्ष् धातु में अ प्रत्यय लगा देने से शि क्षा शब्द का निर्माण हुआ है। शिक्ष् का अर्थ होता है सीखना और सिखाना। अतः शिक्षा शब्द का अर्थ होता है – सीखने-सिखाने की प्रक्रिया।  शिक्षा शब्द अंग्रेजी के ‘एजुकेटम’ का हिंदी रूपांतरण है। ‘एजुकेटम’  शब्द लैटिन भाषा के ( E )  तथा  (Duco) ड्यूको दो शब्दों के मेल है। ए का अर्थ होता है आंतरिक एवं ड्यूको का अर्थ है आगे बढ़ना। अतः बालक की आंतरिक शक्तियों का प्रकृति करण एजुकेशन कहलाता है।

‘शिक्षा’ शब्द का प्रयोग हम दो रूपों में करते हैं – एक प्रक्रिया और दूसरा प्रक्रिया का परिणाम।  शि क्षा का सुचारू रूप से चलना शिक्षा शब्द का प्रयोग  प्रक्रिया के रूप में है और अब हम शिक्षा शब्द का प्रयोग ग्रहण करने के रूप  में करते हैं तो शि क्षा शब्द का प्रयोग परिणाम के रूप में होता है। वास्तव  में आधुनिक शिक्षाशास्त्री शिक्षा शब्द का प्रयोग परिणाम के रूप में नहीं  करते हैं, शिक्षा शब्द को प्रक्रिया के रूप में ही स्वीकार किया जाता है  क्योंकि किसी भी प्रक्रिया में परिणाम अवश्य निहित रहता है। शिक्षा  प्रक्रिया के परिणाम को हम ज्ञान, कौशल एवं परिवर्तन के रूप में अभिव्यक्त कर सकते हैं। 

विभिन्न  दार्शनिकों, समाजशास्त्रियों,  अर्थशास्त्रियों मनोवैज्ञानिकों एवं वैज्ञानिकों ने शि क्षा प्रक्रिया की व्याख्या करने में  मूल भूमिका अदा की है। सबने अपने-अपने दृष्टिकोण से शिक्षा को देखा है और परिभाषित किया है। हम भी यहां शि क्षा के विभिन्न स्वरूपों का अध्ययन करने का प्रयास करेंगे।

शिक्षा का दार्शनिक आधार

मनुष्य  दर्शन का केंद्र  होता है। दार्शनिक मनुष्य के व्यवहारो, उसके वास्तविक स्वरूप को जानने का प्रयास करते हैं और मनुष्य के जीवन का लक्ष्य तय  करते हैं।  दार्शनिक मनुष्य के जीवन के अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति का साधन भी तय करते हैं और इन सभी बातों के ज्ञान एवं प्रशिक्षण के लिए वे शिक्षा को अति आवश्यक बताते हैं।  

अतः हम यह भी कह सकते हैं की दार्शनिकों की दृष्टि से  शिक्षा मनुष्य के जीवन में अंतिम उद्देश्य की प्राप्ति का साधन है। विभिन्न  दर्शन मनुष्य के जीवन का उद्देश्य भिन्न भिन्न मानते हैं। अतः विभिन्न  दार्शनिक विचारधारको ने  शि क्षा को अलग-अलग ढंग से परिभाषित किया है। 

अध्यात्मवादी  मनुष्य के लौकिक जीवन से ज्यादा उसके  परलौकिक जीवन को ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं । वेदांती लौकिक जीवन से सदा के लिए छुटकारा पाने का प्रयत्न करते हैं और इसे मुक्ति नाम देते हैं। शंकराचार्यने कहा भी है, “शिक्षा वह है जो  मुक्ति दिलाएं।”

स्वामी विवेकानंद के शब्दों में, “मनुष्य की अंतर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना शिक्षा है।”

महात्मा गांधी शरीर, मन एवं आत्मा इन तीनों के विकास पर समान बल देते थे,  महात्मा गांधी के शब्दों में “शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक एवं मनुष्य के शरीर, मन  तथा आत्मा के सर्वांगीण एवं सर्वोत्कृष्ट विकास से है।” 

प्लेटों भी शरीर और आत्मा दोनों के महत्व को स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार,  ‘शिक्षा का कार्य शरीर और आत्मा को वह पूर्णता प्रदान करना है जिसके की वे योग्य है।” 

अरस्तु ने  शारीरिक एवं मानसिक विकास पर बल दीया है। उनके अनुसार मनुष्य का उचित शारीरिक एवं मानसिक विकास ही उसे आत्मा की अनुभूति करा सकता है। शिक्षा के विषय में अरस्तु ने कहा है, “स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का निर्माण ही शिक्षा है।” 

भौतिकवादी  मनुष्य के लौकी जीवन को ही सत्य मानते हैं। भौतिकवादियों के अनुसार सुखपूर्वक जीना ही मनुष्य के जीवन का अंतिम उद्देश्य है। इनके अनुसार सुखपूर्वक जीने के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य शरीर एवं मन स्वस्थ हो और साधन सुविधा संपन्न हो। भौतिकवादी दृष्टि मैं शिक्षा, “शिक्षा वह है जो मनुष्य को  सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने योग्य बनाती है।”

पाश्चात्य प्रकृतिवादी दार्शनिक शिक्षा को बहुतिक सुखों की प्राप्ति का साधन मानते है।  वे मनुष्य को अपने अंत:करण एवं बाहरी पर्यावरण से समन्वय स्थापित करने पर बल देते है। स्पेन्सर कहते है, “शिक्षा का अर्थ अंत: शक्तियों का बाह्य जीवन में समन्वय स्थापित करना ही शिक्षा है।”

कुछ पाश्चात्य दार्शनिक मनुष्य को मनुष्य के वास्तविक रूप में देखते है। प्रयोजनवादी मनुष्य को एक सामाजिक प्राणी कहते है और उनका मानना है की मनुष्य में वर्तमान समाज में अनुकूलन करने और भविष्य के समाज का निर्माण ही शिक्षा का कार्य है। प्रयोजनवादी जॉन डीवी ने कहा है – “शिक्षा व्यक्ति की उन सभी योग्यताओं का विकास है जो उसमें अपने पर्यावरण पर नियंत्रण रखने तथा अपनी संभावनाओं को पूर्ण करने की सामर्थ्य प्रदान करे।”

शिक्षा का समाजशास्त्रीय आधार

समाजशास्त्रीय समाज को केंद्र मानकर विचार करते है ए व्यक्ति को समाज के परिप्रेक्ष्य में ही देखते है। शिक्षा को ये व्यक्ति और समाज को विकास का साधन कहते हैं। समाजशास्त्रीयों के विचार में शिक्षा के विषय में निम्नलिखित बातें कही है –

शिक्षा एक अनवरत प्रक्रिया है

समाजशास्त्रियों का मानना है की शिक्षा समाज में सदैव चलती रहती है। मनुष्य के जन्म के कुछ दिनों बाद से ही शिक्षा प्रारंभ हो जाती है और मनुष्य के जीवन के समाप्त होने तक शिक्षा की प्रक्रिया अनवरत चलती रहती है। उनका मानना है के मनुष्य तो आते जाते रहते है लेकिन शिक्षा प्रक्रिया तो  पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है वह रुकती नहीं है। अतः शिक्षा एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।

शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया है 

समाजशास्त्रियों का मानना है की शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया  है, क्योंकि मनुष्य समाज में एक-दूसरे के संपर्क में आकर ही एक दूसरे की भाषा विचार और आचरण से प्रभावित होते है, इसी प्रक्रिया को हम सीखना कहते है और सोद्देश्य सीखने की प्रक्रिया ही शिक्षा कहलाती है। मनुष्य में कुछ सामान्य शक्तियों ऐसी होती है जो वह जन्म के साथ ही लेकत आता है। बोलने की शक्ति तो मनुष्य में जन्म से ही रहती है । लेकिन भाषा क विकास उसकें अपने समाज से ही हो पाता है जिससे वह अपने विचारों को प्रकट करता है। मनुष्य में सभ्यता और संस्कृति का विकास समाज से ही होता है। समाज के अभाव में मनुष्य में भाषा शक्ति एवं विचार शक्ति का विकास नहीं हो पाता है। उसकी शिक्षा होती है।

शिक्षा का संबंध समाज के भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों से होता है। शि क्षा के स्थानांतरण के लिए समाज विद्यालय का सहारा लेता है। एक विशेष काल की विद्यालयी शि क्षा के उद्देश्य, पाठ्यचर्चा एवं शिक्षण विधियाँ सब निश्चित होते है। समाज में परिवर्तन के साथ ए सभी कारक बदलते रहते है। आवश्यकता के अनुसार समाज शिक्षण विधियों, पाठ्यचर्चा एवं शिक्षा के उदेश्यों में परिवर्तन होता रहता है। यदि शिक्षा गतिशील नहीं होती तो हम आज इतना विकास नहीं कर पाते।  

“शिक्षा एक द्विध्रुवीय प्रक्रिया है “

समाजशास्त्रियों के अनुसार शिक्षा में एक पक्ष के प्रभावित होने पर दूसरा पक्ष भी प्रभावित होता है। अतः हम कह सकते हैं की शिक्षा प्रक्रिया के दो ध्रुव है। एक पक्ष प्रभावित करता है और दूसरा पक्ष प्रभावित होता है। जान डीवी ने भी शिक्षा के मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक दो ध्रुव माने है। सामाजिक अंग का अर्थ सामाजिक वातावरण है एवं मनोवैज्ञानिक अंग का अर्थ  उसके सीखने की रुचि एवं रुझान से है। केवल सामाजिक वातावरण ही नहीं बल्कि प्राकृतिक प्रभावित करते है। ये सीखने – सिखाने की परिस्थितियां कहीं जाती है। अतः हमकह सकते है की शिक्षा की प्रक्रिया सीखने वाले और सिखाने की परिस्थितियों कही जाती हैं। अतः हम कह सकते है की शिक्षा की प्रक्रिया सीखने वाले और सिखाने की परिस्थितियों के बीच चलती रहती है।  

विकास की प्रक्रिया है शिक्षा

मनुष्य जब जन्म लेता है तो उसका व्यवहार पशु की भांति होता है। शिक्षा के द्वारा  मनुष्य मे परिवर्तन किया जाता है । विस्तृत दृष्टिकोण से देखा जाए ओ मनुष्य अपने अनुभवों को भाषा के आधार पर सुरक्षित  रखता  है  और  इनको  आने  वाली पीढ़ी को सौंप देता है।  आने वाली पीढ़ी  इस ज्ञान को और आगे बढ़ाती है और अपने विचार और ज्ञान तथा अनुभव को भी उसमें जोड़ देती है। 

इसी तरह किसी भी समाज की सभ्यता एवं संस्कृति का विकास एवं निर्माण होता है जो शिक्षा के बगैर संभव नहीं है। अतः हम कह सकते है की शिक्षा विकास की एक प्रक्रिया है। संसार का प्रत्येक व्यक्ति अपनी जाति के लोगों के बीच रहकर अनुकरण के द्वारा उने अनुसरण चलना, खान और अन्य बातें सिखाता है। पशुओं के जीवन पर विचार करने पर हम पाते है की ए जन्म के कुछ दिन बाद ही पनि जाति के पशुओं की भाँति सभी तरीके सिख जाते है लेकिन यह प्रक्रिया केवल जीवनपायन एवं आत्मरक्षा के कार्यों तक सीमित रहती है।

जबकि मनुष्य केवल परिस्थितियों मे समायोजन ही नहीं सिखाता है, अपितु वह अपने  आपमें अनुकूलन करने की क्षमता का विकास भी करता है। शिक्षा मनुष्य के खाने-पीने- रहने, चलने-बोलने तथा जीवन को सुखमय बनाने में सहयोग करती है और इसी का दूसरा नाम विकास भी है। अतः शिक्षा मनुष्य के विकास का आधार है।

शिक्षा का राजनैतिक आधार 

राजनीतिशास्त्री राज्य और राज्य के शासनतंत्र को आधार बनाकर कार्य करते हैं। वे व्यक्ति एवं समाज दोनों को राज्य और उसकें शासनतंत्र के परिपेक्ष्य में देखते है। राजनीतिशास्त्री शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का साधन मानते हैं। अच्छे राष्ट्र का निर्माण अच्छे नागरिकों से होता है और नागरिक शिक्षा के द्वारा ही अच्छा नागरिक बन सकता है। राजनीतिशास्त्रीयों के अनुसार, “वास्तविक शिक्षा वही है जो अच्छे नागरिकों का निर्माण करती है।“

शिक्षा का वैज्ञानिक अर्थ 

भौतिक जगत एवं भौतिक वस्तुएं वैज्ञानिकों के विचार का केंद्र होती है। वैज्ञानिक किसी बहु वस्तु एवं क्रिया को वस्तुनिष्ठ ढंग से देखते है। 

वैज्ञानिक मनुष्य की जन्मजात शक्तियां के प्रश्न पर तो मनोवैज्ञानिकों से सहमत होते है 

लेकिन बात जब व्यवयहार की होती है तब ये समाजशास्त्रियों का समर्थन करते है। वैज्ञानिक, शिक्षा को मनुष्य की बाह्य परिस्थतियों से  अनुकूलन एवं विकास के  साधन के रूप में स्वीकार करते है।  इनके  अनुसार, “शिक्षा का अर्थ आंतरिक शक्तियों का बाहरी जीवन में समन्वय स्थापित करना है।”

मनोवैज्ञानिक आधार पर शिक्षा 

भारतीय मनोवैज्ञानिक के विचार का केंद्र बिन्दु मनुष्य का बाह्य स्वरूप और उसका अंतःकरण दोनों होते है। बाह्य स्वरूप में वह उसकी कार्मेन्द्रियों एवं ज्ञानइंद्रियों और अन्तः करण में मन, बुद्धि आदि का अध्ययन करता है। उसकी दृष्टि में शिक्षा मनुष्य के अंतःकरण एवं बाह्य इंद्रियों का प्रशिक्षण है।

पाश्चात्य मनोवज्ञानिकों का विचार केंद्र मनुष्य का शरीर, मस्तिक एवं व्यवहार होता है। वे अन्तः करण के मूल तत्त्व मन, बुद्धि और अहंकार की खोज नहीं कर सकते हैं। वे मनुष्य को एक मनोशारीरिक प्राणी मानते हैं जिसके पास जन्म से ही कुछ शक्तियाँ होती है और वह इन शक्तियों का ही विकास करता है। इन शक्तियों का विकास बहूत आवश्यक होता है। पेस्तालोजी ने इस विषय पर विचार किया की इन जन्मजात शक्तियों का विकास किस दिशा में और कितना किया जायें और कहा की यह विकास स्वाभाविक सम और प्रगतिशील होना चाहिए। उन्होंने कहा, “शिक्षा मनुष्य की जन्मजात शक्तियों का स्वाभाविक समरस और प्रगतिशील विकास हैं।”

शिक्षा का वास्तविक अर्थ 

शिक्षा के विषय में सभी लोगों की द्रष्टिकोण भिन्न भिन्न है। ध्यान से देखने पर सभी द्रष्टिकोण एक क्षेत्र विशेष पर सीमित नजर आते हैं। शिक्षा के वास्तविक अर्थ को समझने के लिए हमें सभी तथ्यों पर ध्यान डालना होगा। सभी द्रष्टिकोणों को देखने पर शिक्षा की प्रकृति में ये तथ्य उजागर होते हैं की शिक्षा का सोद्देश्य, गतिशील एवं विकास की प्रक्रिया है। शिक्षा के कार्यों पर विचार करने से यह स्पष्ट होता है की शिक्षा के द्वारा मनुष्य की जन्मजात शक्तियों का विकास, ज्ञान एवं कलकौशल में वृद्धि तथा विचार एवं व्यवहार में परिवर्तन किया जाता है और इस प्रकार उन्हें सभ्य, सुसंकृत एवं योग्य नागरिक बनाया जाता है।

अभी तक हमने शिक्षा की परिभाषाओं का अध्ययन किया है इनमें 1 उनसे शिक्षा प्रक्रिया की प्रकृति का स्पष्ट बोध नही होता है। 2 ये  परिभाषाएं शिक्षा के किसी विशेष उद्देश्य पर जोर देती है। शिक्षा कजी सर्वोत्कृष्ट परिभाषा तो वह होगी जिसमें शिक्षा प्रक्रिया की प्रकृति एवं कार्य दोनों का स्पष्ट बोध हो सकें। हम शिक्षा को किच इस प्रकार परिभाषित कर सकते हैं –

शिक्षा सोद्देश्य सदैव चलने वाली वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य की जन्मजात शक्तियों का विकास, उसकें ज्ञान एवं कौशल में वृद्धि तथा व्यवहार में परिवर्तन किया जाता है और इस प्रकार उसे सभ्य, सुसंकृत एवं योग्य नागरिक बनाया जाता है इसकें द्वारा व्यक्ति एवं समाज दोनों निरंतर विकास करते हैं।

शिक्षा की इस परिभाषा को पूर्ण माना जा सकता है। इस परिभाषा से शिक्षा प्रक्रिया की प्रवृति और इसके कार्यों दोनों का स्पष्ट बोध हो जाता है। मनुष्य को सभ्य, सुसंकृत एवं इच्छा नागरिक बनाने में समाज की शिक्षा के सभी उदेश्य एवं कार्य समाहित है।

शिक्षा का व्यापक अर्थ एवं संकुचित अर्थ

किसी भी समाज मे किसी बालक की शिक्षा उसकें परिवार छोटे-बड़े विभिन्न समूहों सामुदायिक केंद्रों और विभिन्न प्रकार के विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में चलती है लेकिन कुछ लोग विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में चलने वाली शिक्षा को ही शिक्षा कहेते हैं। अतः शिक्षा शब्द का प्रयोग दो अर्थों मे होता है। 1 व्यापक अर्थ  2  संकुचित अर्थ मे

शिक्षा का व्यापक अर्थ

प्रत्येक प्राणी अपनी ही जाति में जन्म लेता है और उसके बीच रहकर अपनी जाति के लोगों की तरह चलना, बोलना, खाना, पीना, सुनना-बोलना और अन्य क्रियाए करना सिखाता है। पैदा होते वह बहूत असहाय होता है लेकिन ह=जन्म से कुछ दिन बाद ही वह अपनी जाति के सदस्यों का अनुकरण करने लगता है और धीरे धीरे अन्य क्रियाएं भी सिख लेता है। बालक अपना पहला पाठ मां की गोद में पढ़ता है फिर अपने आसपास के वातावरण से सिखता है और फिर अब अन्य लोगों के संपर्क में आता है तो उनसे भी कुछ न कुछ सिखता है।

सभ्य समाज बालकों के उचित विकास के लिए विद्यालयों की स्थापना करता हैं। विद्यालय के बाहर भी बालक कुछ कुछ सिखता रहता है। इस शिक्षण व्यवस्था के उद्देश्य पाठ्यक्रम आदि व्यापक होते है। लेकिन इसके बावजूद भी विद्यालय छोड़ने के बाद भी शिक्षा की प्रक्रिया चलती रहती है। व्यापक अर्थमे शिक्षा जीवनभर चलती रहने वाली प्रक्रिया है।

मैकेन्जी ने शिक्षा के व्यापक अर्थ को परिभाषित करते हुए कहा है

ज्यादातर विद्वान इस परिभाषा से सहमत हैं लेकिन इस परिभाषा से शिक्षा प्रक्रिया के स्वरूप एवं उसके परिणाम का ज्ञान नही होता है। हम व्यापक अर्थ में शिक्षा की परिभाषा इस प्रकार दे सकते है –

व्यापक अर्थ में शिक्षा किसी समाज में सदैव चलने वाली वह सोद्देश्य सामाजिक प्रक्रिया हैं, जिसके द्वारा मनुष्य की जन्मजात शक्तियों का विकास, उसके ज्ञान एवं कला कौशल मे वृद्धि एवं व्यवयहार में परिवर्तन किया जाता हैं और उसे एक योग्य नागरिक बनाया जाता है। इसके द्वारा व्यक्ति एवं समाज दोनों विकास करते है।

शिक्षा का संकुचित अर्थ

साधारणतया शालाओं मे चलने वाली शिक्षा को ही शिक्षा कहते है। यही शिक्षा का संकुचि अर्थ हैं। प्रत्येक समाज की अपनी जीवनशैली एवं आकांक्षाएँ होती है और समाज के वयस्क आने वाली पीढ़ी को इस जीवनशैली से प्रशिक्षित करने एवं अपनी आकांक्षाओ की पूर्ति के लिए शिक्षा की व्यवस्था करते हैं। इस शिक्षा व्यवस्था के उद्देश्य, पाठ्यक्रम एवं शिक्षण विधियाँ निश्चित होते हैं। यह शिक्षा बालक की निश्चित आयु में प्रारंभ होती हैं और निश्चित आयु में समाप्त हो जाता है।

यह शिक्षा निश्चित समय में निश्चित स्थान पर निश्चित व्यक्तिओं द्वारा दी जाती है। इस शिक्षा की व्यवस्था समाज या राज्य करता हैं। इस शिक्षा का उद्देश्य राज्य के उद्देश्यों की प्राप्ति का साधन होनी स्वाभाविक हैं। राष्ट्र की उन्नति इस शिक्षा पर निर्भर करती है। संकुची अर्थ में शिक्षा विद्यालय जाने के पहले और विद्यालय छोड़ने के बाद नहीं चलती हैं।

मैकेन्जी ने संकुचित अर्थमे शिक्षा को परिभाषित करते हुए कहा है – “संकुचित द्रस्टि में शिक्षा का अर्थ अपने शक्तियों के विकास और सुधार के लिए किए गये किन्हीं भी चेतनापूर्ण प्रयासों से लिया जा सकता हैं।”

मैकेन्जी ने संकुचित अर्थ में शिक्षा की परिभाषा तो ठीक-ठीक दी है लेकिन इस परिभाषा से भी शिक्षा के स्वरूप एवं परिणाम का स्पष्ट ज्ञान नहीं हो पाता है। हम संकुचित अर्थ में शिक्षा की परिभाषा इस प्रकार दे सकते हैं –

“संकुचित अर्थ मे शिक्षा किसी समाज में एक निश्चित समय तथा निश्चित स्थानों में सुनियोजित ढंग से चलने वाली सोददेश्य सामाजिक प्रक्रिया है जिसकें द्वारा मनुष्य की जन्मजात शक्तियों का विकास उसकें ज्ञान एंव कलाकौशल में वृद्धि एवं व्याहर में परिवर्तन किया जाता है और इस परकर उसे सभ्य सुसंकृत एवं योग्य नागरिक बनाया जाता है। इसकें द्वारा व्यक्ति एवं समाज दोनों विकास करते हैं।”

व्यापक एवं संकुचित शिक्षा में अंतर 

हमने देखा की व्यापक अर्थ मे शिक्षा मनुष्य के जन्म से मृत्यु तक चलती है और इसमें संकुचित अर्थ वाली शिक्षा भी शामिल है। लेकिन इसकें समतय पाठ्यक्रम उद्देश्य एवं शिक्षण विधियों मे अंतर है और हम व्यापक एवं संकुचित अर्थ में अंतर कुछ इस प्रकार कर सकते हैं –

 व्यापक शिक्षा

  • व्यापक अर्थ में शिक्षा जीवन भर चलती है इसमें संकुचित अर्थ वाली शिक्षा भी सम्मिलित रहती है।
    • इसके अंतर्गत नियोजित एम अनियोजित दोनों प्रकार की शिक्षा आती है।
    • इस शिक्षा के उद्देश्य बहूत व्यापक होते हैं, उन्हें सीमा में नहीं बांधा जा सकता है।
    • इसमें पाठ्यक्रम व्यापक होता है और किसी सीमा में उसे नहीं बंधा जा सकता है।
    • इस शिक्षा की शिक्षण विधियाँ विविध होती हैं, उनका वर्णन संभव नहीं हैं।
  • संकुचित शिक्षा
  • संकुचित शिक्षा मनुष्य के जीवन में एक निश्चित काल तक ही चलती है। इसके अंतर्गत केवल विद्यालयीय शिक्षा ही आती है।
    • इसमें केवल नियोजित शिक्षा ही आती है।
    • इस शिक्षा के उद्देश्य सुनिश्चित एवं विकासोन्मुख होते हैं उनकी अपनी सीमा भी निश्चित होती है।
    • इस शिक्षा का पाठ्यक्रम निश्चित होता है उसकी अपनी सीमा नहीं होती है।
    • इस शिक्षा के लिए कुछ शिक्षण विधियों का विधान किया जाता है, उनका वर्णन किया जा सकता है।   

शिक्षा की परिभाषा 

विभिन्न विद्वानों, दार्शनिकों, समाजशास्त्रियों, मनोवैज्ञानिकों एवं शिक्षाशास्त्रियों की विभिन्न परभाषाएं दी गयी है। हम कुछ परिभाषाओं की चर्चा करेंगे।

“शिक्षा वह है जो मुक्ति दिलाए।” – शंकराचार्य

“मनुष्य की अंतनिरहित पूर्णता को अभिव्यक्ति करना ही शिक्षा है।” स्वामी विवेकानंद

“शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक एवं मनुष्य के शरीर, मन तथा आत्मा के सर्वांगीण एवं सर्वोतकृष्ट विकास से है।” – महात्मा गांधी

“शिक्षा का कार्य मनुष्य के शरीर और आत्मा को वह पूर्णता प्रदान करना है जिसकें की वे योग्य हैं।” – प्लेटों

“स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का निर्माण ही शिक्षा है।” – अरस्तु

“.शिक्षा वह है जो मनुष्य को सुखपूर्वक जीवन जीने के योग्य बनाती है।” – चार्वाक

“ शिक्षा का अर्थ अंतः शक्तियों का बाह्य जीवन में समन्वय स्थापित करना है।” – हरवर्ट स्पेन्सर

“ शिक्षा व्यक्ति की उन सभी योग्यताओं का विकास है जो उसमें अपने पर्यावरण पर नियंत्रण रखने एवं अपनी संभावनाओं को पूर्ण करने में सामर्थ्य प्रदान करे।” – डीवी

शिक्षा की प्रकृति

विभिन्न द्रस्टीकोण से विस्तार करने पर शि क्षा की प्रकृति के विषय में निम्नलिखित तथ्य उजागर होते है। 

  • शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया है जिसकें तीन मुख्य अंग है – सिखाने वाला, सीखने वाला और प्रयुक्त होने वाली सामग्री या क्रिया। यह आवश्यक नहीं  है की सिखाने वालों के सामने प्रत्यक्ष रूप में उपस्थित रहता है वह पर्दे के पीछे छिपा हुडा भी रह सकता है।
  • समाज में शिक्षा व्यापक एवं सामाजिक दोनों अर्थों में चलती रहती है लेकिन हमें उसको व्यापक रूप में ही लेना चाहिए। अतः शि क्षा को हम एक अविरत प्रक्रिया भी कह सकते हैं।
  • शिक्षा की विषय सामग्री को किसी सीमा में बांधा जा सकता है व्यापक अर्थ में यह बहूत व्यापक होती है लेकिन संकुचित अर्थ मे शि क्षा की सामग्री पाठ्यक्रम तक ही सीमित रहती है लेकिन दोनों ही अर्थों में शिक्षा समाज का विकास करती हैं।
  • व्यापक अर्थ में शिक्षा की विधियाँ बहूत व्यापक होती है लेकिन प्रायः संकुचित अर्थ में सीमित ही होती है।
  • शिक्षा का स्वरूप समाज में धर्म, दर्शन, संस्कृति, समाज की संरचना, अर्थतन्त्र एवं प्रगति पर निर्भर करता है।
  • किसी का समाज के धर्म-दर्शन, शासन तंत्र अर्थतंत्र एवं वैज्ञानिक परिवर्तनों के साथ साथ उसकी शिक्षा के स्वरूप में भी परिवर्तन होता रहता है। अतः हम कह सकते है की शिक्षा की प्रकृति गतिशील होती है।

शिक्षा के अभिन्न अंग 

शिक्षा के अंगों के विषय में शिक्षाशास्त्रियों में मतभेद हैं। जॉन एडम ने शि क्षा के दो ही अंग माने हैं – पहले शिक्षार्थी एवं दूसरा शिक्षक। जॉन डीवी भी शिक्षा के दो ही अंग मानते है लेकिन दो अंग एडम से भिन्न है उनके अनुसार शि क्षा के दो अंग हैं।

पहला मनोवैज्ञानिक (सिखने वाली की मानसिक स्थिति) दूसरा सामाजिक (सीखने वाले का सामाजिक पर्यावरण) रायबर्न के अनुसार, “शि क्षा के तीन अंग है – शिक्षार्थी, शिक्षक एवं पाठ्यक्रम।” लेकिन पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा तकनीकी के विकास से इस क्षेत्र में क्रांति आ गई है। शैक्षिक तकनीकी विशेषज्ञ शिक्षा के तीन अंगों को स्वीकार करते हैं – शिक्षार्थी, शिक्षक और सीखने-सिखाने की परितस्थितियाँ उसमें  शि क्षा की विधियाँ, पाठ्यक्रम एवं शिक्षण के साधन, प्रकृति पर्यावरण, सामाजिक परिवेश एवं मूल्यांकन की विधियाँ आती है। आधुनिक शिक्षाशास्त्री इन्हीं को शि क्षा के अंग मानते हैं। हम इन सभी की चर्चा यहाँ कर रहे हैं।

शिक्षार्थी 

शिक्षार्थी  का  अर्थ होता है सीखने वाला। शिक्षार्थी शि क्षा प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। शिक्षार्थी के बिना शिक्षा प्रक्रिया के चलने का प्रश्न ही नहीं उठता है। यह बात भी अक्षराः सत्य है की शिक्षार्थी अपनी रुचि, रुझान एवं योग्यता के आधार पर ही सिखाता है। उदाहरण की लिए बालक के सामने अध्यात्म की बात की जाए वो बेचारे कुछ भी समझ नहीं पाएंगे। सीखने का प्रश्न ही नहीं उठता है। अतः शिक्षा की प्रक्रिया बालक की रुचि, रुझान और उनकी योग्यता उनकी आनुवंशिकता एवं पर्यावरण पर निर्भर करती है, अतः शिक्षक को बालक की आनुवंशिकता एवं वातावरण का ध्यान शि क्षा प्रक्रिया में अवश्य ही रखना चाहिए।

शिक्षार्थी कुछ बातें सीखते हैं और कुछ बातें नहीं सीखते हैं। ऐसा क्यों होता है? इस विषय में कई प्रकार के अध्ययन हुए हैं और निष्कर्ष यही निकला है की सीखने की क्रिया शिक्षार्थी के शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, अभिवृद्धि, विकास एवं परिपक्वता, बालक की सीखने की इच्छा उसकें पूर्ण अनुभव एवं ज्ञान, नैतिक गुण, चरित्र, उत्साह एवं थकान और इसकी अध्ययनशीलता पर निर्भर करता है। शिक्षक बालक को सीखने में सहायता करता है। इसी कारण से शिक्षार्थी को शिक्षा का केंद्र माना जाता है और शि क्षा की समस्त योजनाएं बालक या शिक्षार्थी को ध्यान मे रखकर बनाई जाती हैं। यह वाट भी सर्वमान्य है की अंततः हम समाज या राष्ट्र के आदर्श के अनुकूल बनाने का प्रयास करते हैं।  

पाठ्यक्रम 

नियोजित शिक्षा के उद्देश्य निश्चित होते हैं। इन उद्देश्यों की प्राप्ति की लिए बालकों की विभिन्न विषयों का ज्ञान कराया जाता है। 

उनसे कई प्रकार की क्रियाए कराई जाति है। इन्हें ही अमान्यतः पाठ्यक्रम कहा जाता है लेकिन अपने वास्तविक अर्थ में पाठ्यक्रम बहूत अधिक व्यापक होता है। उसके अंतर्गत विषयों के ज्ञान एवं क्रियाओं के प्रशिक्षण के साथ-साथ पूरा सामाजिक वातावरण आता है जिसके द्वारा निश्चित किए गए उद्देश्यों की प्राप्त किया जाता है। पाठ्यक्रम शिक्षक एवं बालक के बीच एक कड़ी का काम करता है। शिक्षक को पाठ्यक्रम से यह पता चल जाता है की उसे क्या सीखना है और शिक्षार्थी भी वह जानता राहत है की उसे क्या सीखना है।

पाठ्यक्रम शिक्षक एवं शिक्षार्थी पर शासन करता है। चाहे वह राज्य द्वारा हो या समाज द्वारा। साम्यवादी एवं राजतंत्र वाले राज्यों में शिक्षा पूर्णतया राज्य के द्वारा चलाई जाती है। वैसे राज्यों में शिक्षक को अपने दर्शन को अभिव्यक्त करने का अधिकार नहीं होता है। शिक्षार्थी भी अपनी योग्यता एवं रुचि के अनुसार शिक्षा ग्रहण नहीं कर पता हैं। वहाँ सभी को राष्ट्र के विचारधारा के अनुसार चलना पड़ता है। लोकतंत्र इस विषय में छूट देता है। लोकतंत्र में यद्यपि पाठ्यक्रम तो राज्य के द्वारा ही निश्चित होता है लेकिन उनमें विकल्प मौजूद रहते हैं और बालक अपनी रुचि, रुझान के अनुसार विकास करने का अवसर पाता है।

जो लोग मानव की प्रकृति का आदर करते हैं वे लोग ऐसी ही शिक्षा का समर्थन करते है। ऐसा नहीं होने पर संसार एक कारागार बन जाएगा और उसकी प्रगति अवरुद्ध हो जायेंगी हमे एक बात पर जरूर गौर करण चाहिए की पाठ्यक्रम स्वयं में साध्य नहीं है यह तो राज्य द्वारा निश्चित किए गए उद्देश्यों की प्राप्ति का साधन होती है। अतः पाठ्यक्रम की साधन में रूप में ही लेना चाहिए। हमारे देश में आज पाठ्यक्रम को ही साध्य माना जाता है और शिक्षक अपनी शक्ति पाठ्यक्रम को साधन में रूप में ही लागा देते हैं और बालक को परीक्षा मे पास कराकर पीठ थपथपाते है। अतः बच्चों को पढ़ाने समय पाठ्यक्रम नहीं अपितु उसके द्वारा प्राप्त होने वाले उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए।

शिक्षक 

शिक्षक के व्यापक अर्थ में रोज एक दूसरे से सीखते है। इसलिए हम सभी शिक्षार्थी एवं शिक्षक दोनों है लेकिन शिक्षा के संकुचित अर्थ में कुछ विशेष व्यक्ति जो जानबूझकर दूसरों को प्रभावित करते है और उनके आचार विचार में परिवर्तन करते हैं वे शिक्षक कहे जाते है।

पुराने जमाने मे शिक्षक को बहूत ऊंचा स्थान प्राप्त था। लोग मानते थे की गुरु के चरण मैं बैठकर कोई भी व्यक्ति ज्ञानी बन सकता है। लेकिन मनोवैज्ञानिक अध्ययन इस बात को साबित कर चुके हैं की बालक का विकास उसकें शिक्षक से ज्यादा बालक प्के ऊपर ही निर्भर करता है। प्रत्येक व्यक्ति में कुछ  जन्मजात शक्तियों के आधार पर ऊनके विकास में सहायता करता है। लेकिन शिक्षक के अभाव में नियोजित शिक्षा की कल्पना आज भी नहीं की जा सकती ही।

शिक्षक वर्ग मे व्यक्ति के रूप में भी उपस्थित रहता है या लेखक के रूप में उपस्थित होता है। शिक्षक कंप्यूटर या शिक्षण कम्यूटर या शिक्षण मशील रूप मे भी उपस्थित हो सकता है। शिक्षक की सहायता इस बात पर निर्भर करती है या शिक्षक अपने दायित्व का निर्वहन तभी का सकता है जब उनमें निम्नलिखित गुण हों। उत्तम शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य, उच्चसामाजिक, उच्च सांस्कृतिक द्रस्टीकोण, स्पष्ट जीवन दर्शन, नैतिकता एवं चरित्र बल, विषय का ज्ञान, विभिन्न विषयों का सामान्य ज्ञान, शिक्षण कौशल एवं संघठन शक्ति। इन गुणों के साथ-साथ शिक्षक को अध्ययनशील एंव प्रगतिशील भी होना चाहिए। शिक्षक को गंभीर एवं विनोदी भी होना चाहिए।  

शिक्षण विधियाँ एवं उपकरण 

शिक्षण क्रिया द्वारा शिक्षक शिक्षार्थियों को ज्ञान प्राप्त करने एवं क्रियाओं में दक्षता के लिए तैयार करता है, उनका मार्गदर्शन करता है, सीखने में सहायता पहुंचाता है और अपनी ओर से कुछ बताकर बालक के ज्ञान में वृद्धि करता है और प्रशिक्षण करता है। यह सरल कार्य नहीं है। शिक्षण कार्य के लिए शिक्षक को अपने शिक्षार्थी को तैयार करना पड़ता है। जिससे की वह सीखने में रुचि ले।

वैसे तो शिक्षण विधियों पर विचार आदिकाल से होता रहता है। लेकिन गत शताब्दी में इस क्षेत्र में संतोषजनक कार्य हुआ है। विभिन्न प्रयोगों के आधार पर हमने ऊनके शिक्षण सिद्धांत, शिक्षण सूत्र, शिक्षण यंत्रों का निर्माण किया है। इन प्रयोग एवं आविष्कारों के कारण अब शिक्षा प्रक्रिया बहुत बदल गई है और यदि कारण है की अब ज्यादा से ज्यादा लोग विभिन्न शिक्षण विधियाँ एवं शिक्षण के उपकरण अपना रहे हैं।     

प्राकृतिक वातावरण  : शिक्षा जिस समय जिस स्थान पर चलती है उस समय एवं उस स्थान का प्राकृतिक वातावरण शिक्षण एवं शिक्षार्थी का प्राकृतिक वातावरण कहलाता है। यदि वातावरण दूषित होता है तो बालक जल्दी थक जाता है। अत्यधिक गर्मी एवं अदत्याधिक सर्दी भी सीखने-सिखाने मे बाधक बन जाती है। इसलिए शिक्षक एवं शिक्षार्थी दोनों के प्राकृतिक वातावरण का ध्यान रखना आवश्यक है और प्राकृतिक वातावरण को भी शिक्षा के अंग के रूप में स्वीकार किया गया है।

प्राचीन काल में बालक गुरकुलों में रहते थे। गुरुकुल नगरों से दूर सुंदर प्राकृतिक वातावरण में बनाए जाते थे। वहाँ का वातावरण शुद्ध होता था लेकिन आज जब जनसंख्या बहूत ज्यादा बढ़ गई है और गुरुकुल या आश्रम प्रणाली संभव नहीं है, लेकिन विद्यालय प्रांगण को शुद्ध रखा जा सकता है। प्रांगण में फल – फूल के वृक्ष लगाये जा सकते हैं। बालक की पढ़ाई का समय जलवायु के अनुसार निश्चित होना चाहिए।

सामाजिक वातावरण  : हम जिन लोगों के बीच रहते है, जिनसे बात करते हैं, वे और ऊनकी भाषा, विचार, सभ्यता एवं संस्कृति ही हमारा सामाजिक पर्यावरण का पूरा-पूरा प्रभाव बालक की शिक्षा और विकास पर पड़ता है। इसी कारण से आज सामाजिक पर्यावरण को भी शिक्षा का अंग माना जाता है।

प्राचीन गुरु आश्रमों जो नगरों से दूर सूरम्य प्राकृतिक वातावरण में होते थे, गुरु शिष्य के संबंध, शिक्षकों के आपसी संबंध, गुरुआश्रमों की व्यवस्था और गुरु आश्रमों की आचरण प्रणाली शिक्षक एवं शिक्षार्थियों का सामाजिक वातावरण होता था इस कारण बच्चों में उच्च संस्कार आ जाते थी। आज की शिक्षा में भिन्नता है आज तो शिक्षार्थी कुछ समय परिवार में, कुछ समय अपने पड़ोस में तो कुछ समय अन्य स्थिति से प्रभावित होते है और प्रभावित करते हैं। अतः बच्चों को सुसंकृत एवं सामाजिक बनने के लिए यह आवश्यक है की घर, समाज या विद्यालय सभी जगह बच्चों के साथ प्रेम, सहानुभूति और सहयोग पूर्ण व्यवहार हो।   

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